मंदिर में भी दिखा ठंड का असर

देवघर : बाबा मंदिर में भक्तों की चहलकदमी काफी कम दिखी. दोपहर तक मंदिर करीब पूरी तरह से खाली रहा. सुबह से ही लोग ठंड से बचने के लिये अलाव व धूप का सहारा लेते दिखे. मंदिर में गेटों पर तैनात पुलिस बल व मंदिर कर्मचारी भी ठंड से बचने के लिये धूप सेंकते दिखे. […]

देवघर : बाबा मंदिर में भक्तों की चहलकदमी काफी कम दिखी. दोपहर तक मंदिर करीब पूरी तरह से खाली रहा. सुबह से ही लोग ठंड से बचने के लिये अलाव व धूप का सहारा लेते दिखे. मंदिर में गेटों पर तैनात पुलिस बल व मंदिर कर्मचारी भी ठंड से बचने के लिये धूप सेंकते दिखे. पुलिस वाले जहां एक तरफ सुविधा केंद्र में धूप का आनंद ले रहे थे. मंदिर कर्मचारी परिसर के दुर्गा मंडप की सीढ़ी पर बैठ कर धूप का आनंद लेते दिखे.

जारी रहेगी जाड़े से जंग!
उमेश कुमार
इ न दिनों भइया, जाड़ा ही बातचीत का केंद्रीय मुद्दा है. पूरे उत्तर भारत की तरह बाबानगरी भी जाड़े की चपेट में है. शीतलहरी से प्रशासन के कान खड़े हो गये हैं. चौक-चौराहों पर अलाव का इंतजाम किया जा रहा है. रोजाना डाॅक्टरों की सलाहतें आ रही हैं. ठंड में बाहर नहीं निकलें. गर्म खायें और पहनें. सूचना-स्रोतों में भी ठंड में अनेक चीजों से परहेज की अनवरत अपीलें हैं. बुधवार की सुबह दूर तलक घने कोहरे की चादर, सड़क किनारे लगे वेपरलाइट की चमक कोहरे से फीकी पड़ गयी है. सोचा, इतनी ठंड में जिंदगानियां लिहाफ में पड़ी गुलाबी जाड़े का सजदा कर रही होगी. तभी सड़क की धुंध पर कुछ परछाइयां सी उभरीं.
पास आने पर परछाइयां भक्तों की शक्ल में दिखीं. लोटे में जल लेकर बाबा की दर पर बढ़ते उनके कदमों की थाप जाड़े को चुनौती देती जान पड़ी. एक क्षण बीता कि बरगाछ (झौंसागढ़ी) के पास दनादन कई ऑटो रुके. सबमें तरह-तरह की तरकारियां, प्लास्टिक के बोरे में बंधी तरकारियां जितनी तेजी से फेंकी जाने लगीं, उतनी तेजी से समेटी-सहेजी जाने लगी. सामने की चाय दुकान पर अंगीठी कब की जल चुकी है. अल्युमीनियम के बड़े से ‘सस्पेन’ में चाय उबल रही है. देवघर वाले की पसंद को ध्यान में रखते हुए चायवाला दूध ज्यादा, पानी कम देकर ग्राहकों से बतिया रहा है. तभी सर्र से ‘हॉकर’ की साइकिल गुजरती है और ‘दन्न’ से मुड़ा ‘प्रभात खबर’ चायवाले की गोद में गिरता है. ये ‘हॉकर’ भी कमाल के निशानची होते हैं. खड़े-खड़े दाे माले पर भी अखबार फेंक देते हैं. बिल्कुल सही दरवाजे पर न इधर न उधर! सड़क किनारे स्कूल बस के इंतजार में खड़े बच्चे हॉकर की कलाकारी देख रहे हैं. ज्यादातर बच्चे-बच्चियां प्राइवेट स्कूल के हैं. इतनी ठंड में इन्हें यूनिफाॅर्म में स्कूल के लिए तैयार देखना विस्मय जगाता है. विश्वास न हो तो अपने बचपन का दौर याद कीजिये. जाड़े में बाप-दादा सूरज निकलने से पहले रजाई से हाथ तक बाहर नहीं करने देते थे. कुछ ही सालों में कितना बदलाव आया है. आज के बच्चों में किस कदर जिम्मेदारी का भाव भरा है. क्रिसमस की छुट्टियां आज से खतम और पौ फटने के साथ स्कूल के गेट भी खुल रहे हैं. अभिभावकों ने भी मौजूदा वक्त के साथ अपने को ढाल लिया है. सिर और छाती ढंके अनेक अभिभावक बच्चों को बस पर चढ़ाने के लिए न जाने अपना कौन-कौन सा ‘नित्यकार्य’ छोड़ कर आये हैं.

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