देवघर : संचार क्रांति के इस युग में भी किताबों का महत्व कम नहीं हुआ है. जब व्हाट्सएप व फेसबुक जैसी सोशल साइट्स की धूम है, इंटरनेट पर हर प्रकार की जानकारी लोगों के लिए उपलब्ध है. तब भी देवघर के नगर पुस्तकालय में किताबें पढ़ने के लिए युवाओं व बुजुर्गों सहित हर उम्र के लोगों की भीड़ देखते ही बनती है. सीमित संसाधन और बिना किसी सरकारी मदद के नगर पुस्तकालय सप्ताह के सातों दिन खुलता है. सुबह सात बजे से रात के नौ बजे तक बगैर किसी व्यवधान के सेवा दी जा रही है. पुस्तकालय के पाठकों की संख्या पांच सौ से ज्यादा है, लेकिन, औसतन हर दिन करीब ढाई सौ की संख्या में पुस्तक प्रेमी नगर पुस्तकालय पहुंचते हैं. पाठकों की मांग पर पुस्तकालय का साप्ताहिक अवकाश भी खत्म कर दिया गया है.
10 हजार से ज्यादा है पुस्तकें : नगर पुस्तकालय देवघर में दस हजार से ज्यादा पुस्तकें उपलब्ध हैं. इसमें सामान्य प्रतियोगिता परीक्षा के अलावा एकेडमिक पुस्तकें, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, फणीश्वरनाथ रेणु, मुंशी प्रेमचंद, राजेंद्र प्रसाद सरीखे लोगों की लिखी साहित्यिक पुस्तकें उपलब्ध हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद बोस, डॉ राजेंद्र प्रसाद, एपीजे अब्दुल कलाम, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों की जीवनी से संबंधित पुस्तकें भी नगर पुस्तकालय में उपलब्ध हैं. सैकड़ों कहानी संग्रह, एनसीइआरटी की पुस्तकें भी पुस्तकालय में हैं. हिंदी व अंगरेजी भाषा के विभिन्न पंद्रह दैनिक समाचार पत्र व पत्रिकाएं भी पुस्तकालय में आती हैं.
सुरक्षा व मॉनिटरिंग के लिए सात सीसीटीवी
नगर पुस्तकालय में किताबों की सुरक्षा एवं समुचित मॉनटरिंग के लिए कुल सात सीसीटीवी लगाए गये हैं. सीसीटीवी लगने के बाद पुस्तकालय कर्मियों को मॉनिटरिंग करने में ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है. आने वाले समय में वाइ-फाइ लगाने पर भी विचार किया जा रहा है.
आवंटन नहीं, किराये के पैसे से होता है पुस्तकालय का संचालन : वर्ष 1996 में स्थापित नगर पुस्तकालय को आज तक कोई आवंटन नहीं मिला है. भवन में चलने वाले सर्व शिक्षा अभियान के कार्यालय, टाउन हॉल एवं दुकानों के किराये से ही पुस्तकालय का मेंटेनेंस एवं कर्मियों को मानदेय आदि का भुगतान किया जा रहा है.
कहते हैं लाइब्रेरियन
लाइब्रेरियन मनोज कुमार ने कहा कि पुस्तकालय में अब भी सुधार की आवश्यकता है. पाठकों की बढ़ती संख्या के अनुसार बैठने की क्षमता नहीं है. पुस्तकालय के लिए कोई आवंटन नहीं मिलता है. किराये से प्राप्त पैसों से ही मानेदय सहित सभी प्रकार का मेंटेनेंस करना पड़ता है. पानी की कमी है. पीने का पानी भी खरीदना पड़ता है.
