संताल परगना जैसे पिछड़े इलाके में लोग पेट काटकर अपनी कमाई में से कुछ पैसे बचत करने के चक्कर में फरजी ननबैंकिंग के चंगुल में फंस गये. जल्दी ज्यादा लाभ पाने की लालच के कारण इनका पैसा तो लुटा ही, अब इनके सपने भी टूट चुके हैं. क्योंकि अब लोगों की गाढ़ी कमाई के वापस […]
संताल परगना जैसे पिछड़े इलाके में लोग पेट काटकर अपनी कमाई में से कुछ पैसे बचत करने के चक्कर में फरजी ननबैंकिंग के चंगुल में फंस गये. जल्दी ज्यादा लाभ पाने की लालच के कारण इनका पैसा तो लुटा ही, अब इनके सपने भी टूट चुके हैं. क्योंकि अब लोगों की गाढ़ी कमाई के वापस आने की उम्मीद टूट रही है. सरकार के स्तर से ऐसा कोई प्रयास भी नहीं हो रहा है. पहले पुलिस, उसके बाद सीआइडी और अब सीबीआइ पिछले चार साल से जांच में जुटी है. लेकिन अभी तक न तो किसी भी ननबैंकिंग के अधिकारी की गिरफ्तारी हुई है और न ही उन कंपनियों की संपत्ति का पता लगाकर उसे जब्त करने की कार्रवाई हुई है.
यही कारण है कि अब लोग पैसा पाने की उम्मीद छोड़ चुके हैं. लोगों का कहना है कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट सहारा पर शिकंजा कस कर लोगों के पैसे वापस करने की दिशा में ठोस कार्रवाई कर रहा है नन बैंकिंग पर शिकंजा कसकर इसी तरह का प्रयास संताल के गरीबों का पैसा वापस दिलाने की दिशा में होना चाहिए.
देवघर: वर्ष 2013 में 27 और पूरे संताल के छह जिले में 109 नन बैंकिंग कार्यालयों में छापेमारी हुई थी. इसमें से 85 कार्यालयों को सील किया गया. इन नन बैंकिंग कंपनियों ने सेबी और आरबीआइ के नियमों को ताक पर रखकर बिजनेस किया है. लोगों की गाढ़ी कमायी को विभिन्न प्रकार का प्रलोभन देकर जमा करवाया है. वर्ष 2013 में तत्कालीन देवघर के एसडीएम आइएएस उमाशंकर सिंह ने देवघर अनुमंडल से छापेमारी की शुरुआत थी.
संताल से ले गये 100 करोड़ से अधिक : संताल परगना में इन कंपनियों ने तकरीबन 100 करोड़ रुपये से अधिक डकार गयी हैं. जिन लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई इन नन बैंकिंग कंपनियों में जमा कराया है, अब उनके हाथ निराशा लगी है. क्योंकि अब सीबीआइ जांच चल रही है. जितने भी कार्यालय चल रहे थे, सभी बंद हो गये हैं, अधिकांश के तो नामोनिशान तक मिट गये हैं. देवघर जिले में तकरीबन 27 नन बैंकिंग कंपनियां काम कर रही थी. इन कंपनियों ने कुल 39 करोड़ 27 लाख 32 हजार की रकम जमा करवाया था. यह रकम 21 नन बैंकिंग कंपनियों के हैं. जबकि छह कंपनियों ने कितना जमा कराया, इसका आंकड़ा ही नहीं दिया. लेकिन कारोबार ये सालों से कर रहे थे. इसी तरह मधुपुर अनुमंडल में भी एक दर्जन कंपनियों के कार्यालय सील हुए. तकरीबन 10 से 15 करोड़ तक राशि जमा कराने के सुबूत भी मिले. तत्कालीन एसडीओ ने सभी नन बैंकिंग कंपनी के कार्यालय को सील किया था. इस तरह सिर्फ देवघर जिले के नन बैंकिंग कंपनियां 50 करोड़ से अधिक लेकर गायब हो गयी.
सुस्त है सीबीआइ जांच भी : देवघर जिले में सभी पर एफआइआर भी दर्ज हुआ. लेकिन एफआइआर के बाद पुलिसिया जांच शिथिल रही. बाद में मामले को सरकार ने सीआइडी को सौंपा. इसके बाद सरकार ने इस केस को सीबीआइ के सुपूर्द कर दिया. सीबीआइ ने केस का चार्ज लेते ही छापेमारी की. देवघर में एक साथ सभी कार्यालय का सील खोला गया और नन बैंकिंग कंपनियों के तमाम दस्तावेज, डिजीटल सुबूतों को सीबीआइ ने जब्त किया और अपने साथ ले गयी.
बीआइ जांच के बाद जब कार्यालय का सील खोला गया और दस्तावेजों को सीबीआइ अपने साथ ले गयी. इसके बाद अब 90 फीसदी नन बैंकिंग कार्यालयों का नामोनिशान तक नहीं है.अब तो सीबीआइ की अदालत ने प्राइवेट भवन में जितने नन बैंकिंग कार्यालय चल रहे थे, जिसे सील किया गया था, सभी को खाली करवाकर मकान मालिक को सौंपने का आदेश जिला प्रशासन को दिया है. लेकिन मकान मालिकों का आरोप है कि जिला प्रशासन अदालत की आदेश की अनदेखी कर रहा है. इस कारण कई वर्षों से मकान सील बंदी में फंसा हुआ है. जिससे आर्थिक नुकसान हो रहा है.
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इस कड़ी में कल से चीट फंड के शिकार लोगों की पीड़ा से पाठकों को रू-ब-रू करायेंगे. इसलिए जो लोग भी चीट फंड कंपनी की ठगी के शिकार हुए हैं या पैसा जमा किये और डूब गया है, ऐसे लोग अपनी पीड़ा प्रभात खबर को इ-मेल करें या लिखकर दें या कार्यालय आकर बतायें. प्रभात खबर आपकी पीड़ा को हू-ब-हू प्रकाशित करेगा. इसका उद्देश्य मात्र है कि सरकार व जांच कर रही एजेंसी के जेहन में ये बात जाये कि सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने से नहीं होगा, लोगों की गाढ़ी कमाई उन नन बैंकिंग कंपनियों से वापस कैसे मिले, इस पर भी ठोस पहल हो.