मयूरहंड. मयूरहंड दुर्गा पूजा का इतिहास 86 वर्ष पुराना है. यहां दुर्गा पूजा वर्ष 1939 में शुरू हुई थी. पहली बार जंगल की लकड़ी से बना झोपड़ी में प्रतिमा स्थापित कर गांव के ग्रामीणों ने मां की आराधना की शुरुआत हुई की थी. फिलहाल मां की पूजा-अर्चना के लिये बड़ा व भव्य मां का दरबार है. जिसमें प्रत्येक वर्ष मां की प्रतिमा स्थापित कर भक्तिभाव से पूजा-अर्चना की जा रही है. प्रतिदिन मध्यप्रदेश के रतलाम से आयी प्रवचनवाचिका ममता दीदी पाठक प्रवचन कर लोगों में श्री राम कथा की जानकारी दे रही है. पूजा को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष अश्वनी कुमार सिंह, सचिव संतोष कुमार सिंहा समेत अन्य लगे हुए है. 25 साल पहले मुकुट की चढ़ावा के लिये मयूरहंड गांव निवासी स्व. प्रयास राणा ने अपने नाम से बोली बोलकर नंबर लगाया था. 2025 में उनके परिवार को मुकुट की चढ़ाने का मौका मिला. उनके पुत्र मनोज राणा व सुबोध राणा ने अपने परिवार के साथ बाजे-गाजे के साथ दुर्गा मंदिर पहुंच कर पूजा अर्चना कर मां दुर्गा के चरणों मे मुकुट को अर्पित किया. उसके बाद बंगाल के कारीगर शिबू मिस्त्री व कांति मिस्त्री ने मां को मुकुट से सुशोभित किया. 2066 तक मुकुट की चढ़ावा के लिये नंबर लगाया जा चुका है. शिबू व कांति मयूरहंड में पिछले वर्ष 2008 यानी 17 वर्षों से लगातार प्रतिमा का निर्माण कार्य करते आ रहे हैं.
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