भू माफियाओं की भेंट चढ़ी मगध कोल परियोजना, नहीं हो पा रहा विस्तार

एशिया की सबसे बड़ी कोल परियोजना मानी जाने वाली मगध कोल परियोजना का विस्तार पिछले दो वर्षों से अटका हुआ है.

बरुण सिंह

टंडवा. एशिया की सबसे बड़ी कोल परियोजना मानी जाने वाली मगध कोल परियोजना का विस्तार पिछले दो वर्षों से अटका हुआ है. लातेहार जिले में जमीन की कमी के कारण खनन ठप हो गया है और अब इसे चतरा जिले के देवलगड्डा पैच में शुरू करने की योजना है. लगभग 500 एकड़ भूमि पर प्रस्तावित इस नए फेज में 192 हेक्टेयर वन भूमि और 100 एकड़ रैयती भूमि शामिल है. वन भूमि पर आदिवासियों को जिला प्रशासन द्वारा वन पट्टा दिया गया है, लेकिन सत्यापन प्रक्रिया लंबी है. इस बीच भू-माफियाओं की सक्रियता ने परियोजना को गंभीर संकट में डाल दिया है.

भूमि विवाद और भू-माफिया की भूमिका

ग्रामीणों का कहना है कि भू-माफिया नौकरी और मुआवजे के लालच में फर्जी कागजात तैयार कर रहे हैं. जैसे ही खनन शुरू होता है, वे असली रैयतों से पहले फाइल लगाकर लाभ उठा लेते हैं. इससे मूल रैयत विस्थापन और पुनर्वास के अधिकार से वंचित रह जाते हैं. ग्रामीणों ने उपायुक्त को अवगत कराया है कि पहले फर्जी जमाबंदी रद्द की जाये और असली रैयतों को लाभ दिया जाये.

केस स्टडी: रामचंद्र वंशल बनाम सुंडी परिवार

बोकारो जिले के रामचंद्र वंशल ने जीएम खाता 278 में तीन एकड़ जमीन फर्जी तरीके से अपने नाम करायी. असली मालिक रामलाल सुंडी और लक्षण सुंडी के वंशजों को नौकरी मिल गयी, लेकिन कोर्ट के आदेश से मुआवजा वंशल परिवार को दे दिया गया. नतीजा यह हुआ कि नौकरी किसी और को मिली और मुआवजा किसी और को. अब असली रैयत न्यायालय का चक्कर काट रहे हैं. यह उदाहरण बताता है कि किस तरह भू-माफिया और सिंडिकेट मिलकर परियोजना में बाधा डाल रहे हैं.

खनन क्षमता

देवलगड्डा पैच में लगभग 80 मिलियन टन कोयले का भंडारण है. अनुमान है कि यहां तीन वर्षों तक खनन किया जा सकता है. यह परियोजना न केवल क्षेत्रीय रोजगार और राजस्व का स्रोत बन सकती है बल्कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकती है. लेकिन भूमि विवाद और फर्जीवाड़े के कारण इसकी शुरुआत ही नहीं हो पा रही है.

कंपनी का रुख

मगध में खनन कर रही वीपीआर कंपनी के मैनेजर निवासन रेड्डी ने कहा है कि कंपनी ग्रामीणों के साथ है. जब तक ग्रामीण सहमति नहीं देंगे, चतरा जिले में खनन संभव नहीं है. कंपनी ने स्पष्ट किया है कि फर्जीवाड़े की जांच और असली रैयतों को न्याय दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है.

प्रमुख चुनौतियाँ

फर्जी जमाबंदी : असली रैयतों को विस्थापन और पुनर्वास का लाभ नहीं मिल पा रहा, न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता : कोर्ट में लंबी लड़ाई से ग्रामीण परेशान, परियोजना ठप : दो साल से विस्तार रुका हुआ है, जिससे उत्पादन और रोजगार प्रभावित.

विश्वास का संकट : ग्रामीणों और कंपनी के बीच भरोसे की खाई बढ़ रही है.

संभावित समाधान

– जिला प्रशासन को प्राथमिकता से सत्यापन कर फर्जी जमाबंदी रद्द करनी चाहिये. – ग्राम सभा और पारदर्शी संवाद के माध्यम से ग्रामीणों की सहमति सुनिश्चित की जाये . भूमि अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया में डिजिटल रिकॉर्ड और पारदर्शिता बढ़ायी जाये. विस्थापित आदिवासियों को नौकरी, आवास और शिक्षा जैसी सुविधाएं दी जायें.

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Author: VIKASH NATH

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