महात्मा गांधी के गोमिया दौरे की अनसुनी कहानी, मचान पर चढ़कर टीन के भोंपू से दिया था भाषण

1934 में महात्मा गांधी ने गोमिया के गोमीबेड़ा में मचान पर चढ़कर लोगों को संबोधित किया था। जानिए बापू के बेरमो दौरे और स्वतंत्रता सेनानी होपन मांझी की कहानी।

28 अप्रैल 1934 को महात्मा गांधी बेरमो अनुमंडल के गोमिया आये थे. करमाटांड़ निवासी स्वतंत्रता सेनानी होपन मांझी के नेतृत्व में हजारों लोगों के जत्थे ने गांधीजी को बैलगाड़ी के जुलूस के साथ करमाटांड़ गांव लाया था. इस दौरान बापू ने कोनार नदी के किनारे गोमीबेड़ा में जनसभा को भी संबोधित किया था. यहां मचान पर चढ़ कर बापू ने टीन के भोंपू से सभा को संबोधित किया था.

प्रचंड गर्मी में भी लोग जुटे थे बापू को सुनने

प्रचंड गर्मी के बावजूद हजारों लोग उन्हें देखने-सुनने जुटे थे. लोग दूर-दूर से बैलगाड़ी, साइकिल या पैदल पहुंचे थे. गोमीटांड़ के सामने इमली पेड़ के निकट तोरण द्वार बनाया गया था. बापू ने लोगों से स्वतंत्रता आंदोलन को सफल बनाने की अपील की थी.

बापू के भाषण से प्रभावित होकर कई आंदोलन में कूद पडे़ थे. कई लोगों ने मांस-मदिरा का भी त्याग कर दिया था. स्वदेशी अपनाने की मुहिम चल पड़ी थी. लोग खुद चरखा से सूत कात कर वस्त्र बनाने लगे थे.

बापू होपन की झोपड़ी में रुके थे

बापू करमाटांड़ गांव में होपन मांझी व उनके पुत्र लक्ष्मण मांझी के टूटे-फूटे खपरैल मकान में रात में रुके भी थे. संताल बहुल करमाटांड़ गांव में पैर पुजाई व लोटा पानी देकर बापू का स्वागत किया गया था. दोपहर में बापू को होपन मांझी के परिजनों ने खाने में महुआ व बाजरे की रोटी और महुआ का लाठा परोसा था, जिसे बापू ने चाव से खाया था. होपन मांझी के घर के आंगन में तुलसी पिंडा की बापू ने पूजा भी की थी. वह तुलसी पिंडा आज भी है.

बापू के सिद्धांतों व अहिंसावादी नीतियों से थे प्रेरित होपन मांझी

होपन मांझी बापू के सिद्धांतों व अहिंसावादी नीतियों से प्रेरित थे. उनके चार पुत्र थे. लक्ष्मण मांझी, जवाहर मांझी, देशबंधु मांझी व चंद्रशेखर मांझी. लक्ष्मण मांझी का निधन वर्ष 1990 में हुआ था. स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मण मांझी के पुत्र भगवान दास मांझी का भी निधन हो चुका है.

होपन मांझी दो भाई थे. उनके बड़े भाई बड़का मांझी के वंशज अभी हैं. होपन मांझी के पोता गुना राम मांझी हैं. होपन मांझी के खिलाफ अंग्रेजी हुकूमत ने दो हजार रु का जुर्माना लगाया था और जुर्माना नहीं देने पर 27 जुलाई 1930 से लेकर 31 मार्च 1931 तक उन्हें हजारीबाग केंद्रीय कारा में रखा गया था. 1950 से लेकर 1952 तक होपन मांझी एमएलसी रहे. उनके पुत्र लक्ष्मण मांझी 1952 से लेकर 1957 तक मनोनीत विधायक रहे. वर्ष 2003 में गोमिया के पूर्व विधायक स्व माधवलाल सिंह ने होपन मांझी के नाम पर तोरणद्वार बनाया था.

राम प्रसाद कसेरा ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया था स्वतंत्रता संग्राम में

नावाडीह में कांग्रेस पार्टी से जुडे़ राम प्रसाद कसेरा स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हें इसके लिए पेंशन भी मिलती थी. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी थी. गांव-गांव पैदल घूम कर लोगों को देश की आजादी की अहमियत समझाते थे.

उनके सहयोगियों में पूर्व मुखिया जगदीश महतो, देवी महतो, रामटहल साव आदि थे. कहते हैं स्वतंत्रता आंदोलन के समय केबी सहाय (पूर्व मुख्यमंत्री) ने कई माह तक ऊपरघाट को छुप कर रहने का ठिकाना बनाया था. भाकपा नेता व पूर्व मुखिया अनंतलाल महतो बताते हैं कि टेको महतो उन्हें खाना खिलाते थे. केबी सहाय ने टेको महतो को बेरमो स्थित स्वांग-पिपराडीह कोलियरी में नौकरी दिलायी थी.


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By Rakesh verma

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