Bokaro News : नावाडीह प्रखंड में 10 जगह होती है दुर्गा पूजा

Bokaro News : नावाडीह प्रखंड के करीब 10 स्थानों पर सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा होती आ रही है.

राकेश वर्मा, बेरमो, नावाडीह प्रखंड के करीब 10 स्थानों पर सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा होती आ रही है. सबसे पहले से दहियारी में पूजा की जा रही है. 164 साल पहले कोलकाता से व्यापार करने के उद्देश्य से बंगाली समाज के कई लोग गोमो आकर दहियारी व कंचनपुर गांव में आकर बस गये. स्व वेणी नायक की अगुवाई में वर्ष 1860 में दहियारी में दुर्गा पूजा शुरू की गयी. पहले पूजा के दौरान यहां मां के चरणों में फल-फूल ही नहीं, बल्कि सोने-चांदी के जेवरात भी चढ़ाये जाते थे. ये जेवरात बंग समाज के मुखिया के पास रखे जाते थे. विसर्जन के बाद यहां भोंगा मेला लगता है.

भलमारा में लगभग डेढ़ सौ साल से दुर्गा पूजा हो रही है. यहां जटली दीदी ने चार आना से पूजा शुरू की थी. तेलो के हटियाटांड़ में वर्ष 1965 से पूजा हो रही है. सप्तमी से दशमी तक यहां मेला भी लगता है. पपलो में भी 60 साल से अधिक समय से आयोजन हो रहा है. कंचनपुर बंगाली टोला में भी पूजा होती है. गुंजरडीह की पूजा आजादी के पहले से हो रही है. यहां दशमी के दिन मेला लगता है. नावाडीह थाना परिसर से सटे दुर्गा मंदिर में वर्ष 1956 से पूजा शुरू हुई. भंडारीदह की एसआरयू कॉलोनी में 60 के दशक से पूजा हो रही है. परसबनी पंचायत के कंचनपुर में डॉ राम गोपाल भट्टाचार्य के नेतृत्व में बंगाली समाज ने 1905 में दुर्गा पूजा शुरू की थी. यहां के डॉ कन्हाई लाल भट्टाचार्य के अनुसार उनके दादा अनुकूल चंद्र भट्टाचार्य के दादा डॉ राम गोपाल भट्टाचार्य कोलकाता से आकर कंचनपुर में बसे थे. भले ही यहां पूजा की शुरुआत बंगाली समाज से जुड़े लोगों ने शुरू की, लेकिन बाद में मूलवासियों का भी सहयोग मिलने लगा.

लहिया में नहीं होती प्रतिमा की स्थापना

ऊपरघाट क्षेत्र के लहिया में मां की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है. यहां देवी निराकार हैं. अष्टमी के दिन गाजे-बाजे के साथ श्रद्धालु नजदीक के तालाब में जाकर पूजा करते हैं. एक महिला माथे पर कलश लेकर चलती है और सैकड़ों महिलाएं पीछे से दंडवत करती चलती हैं. सभी श्रद्धालु तालाब से जल लेकर मंदिर आते हैं. नवमी के दिन बलि देने की प्रथा है. पहले भैंसा की बलि दी जाती थी, जिसे कुछ वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने बंद करवा दिया. ऊपरघाट के सिर्फ हरलाडीह में प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है.

चिरुडीह में भी शुरू हुई वैष्णवी पूजा

चंद्रपुरा प्रखंड के चिरुडीह गिरि टोला स्थित दुर्गा मंडप में ब्रिटिश काल से मां की पूजा होती आ रही है. करीब 60 घरों वाले इस गांव में पहले हर घर से एक-एक बकरे की बलि दी जाती थी. बाद में ग्रामीणों ने इस प्रथा को बंद करा दिया. इसके बाद यहां वैष्णवी पूजा शुरू हुई. तुपकाडीह स्थित स्टेशन रोड दुर्गा मंदिर में भी वर्ष 2003 से लोगों ने वर्षों से आ रही बलि प्रथा को बंद कर वैष्णवी पूजा की शुरुआत की.

मां ब्रह्मचारिणी की हुई पूजा, आरती में उमड़े श्रद्धालु

फुसरो. बेरमो कोयलांचल के विभिन्न दुर्गा मंदिरों, पूजा पंडालों व घरों में मंगलवार को मां दुर्गा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की गयी. संध्या आरती में भाग लेने के लिए पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी. नवरात्र को लेकर क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय हो गया है.

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