Bokaro News :राकेश वर्मा, बेरमो. झारखंड केशरी बिनोद बिहारी महतो के अलग झारखंड राज्य का सपना आज जरूर साकार हो गया, लेकिन जिस शोषण मुक्त झारखंड राज्य का सपना उन्होंने देखा था, वह आज भी अधूरा है. बिनोद बाबू की अगुवाई में अलग झारखंड राज्य का जो आंदोलन छेड़ा गया था, उसमें दरअसल अलग राज्य के साथ-साथ आत्मसम्मान, अस्मिता, अस्तित्व व मुक्ति की बातें भी निहित थीं. उस लड़ाई में झारखंड के दबे-कुचले अवाम को एहसास करा दिया था कि शोषण की जड़ें कहां हैं और उनके वर्ग दुश्मन कौन हैं. ऊंचाई पर रहने के बावजूद बिनोद बाबू ने हमेशा उन दुश्मनों के साथ दूरी बनाये रखी. उनके अदम्य साहस, कुशल नेतृत्व एवं आक्रामक तेवर के आगे कोयलांचल के तमाम माफियाओं एवं नौकरशाहों की बोलती बंद थी. नि:संदेह उस आंदोलन ने यहां के शोषित व उत्पीड़ित लोगों को पहचान दी. ‘पढ़ो व लड़ो’ का नारा देनेवाले बिनोद बाबू का सपना था कि अलग झारखंड राज्य निर्माण हो, जो शोषण मुक्त हो.
डीवीसी प्रबंधन के साथ किया एग्रीमेंट आज भी है जीवित :
90 के दशक में ही बिनोद बाबू ने बेरमो अंतर्गत सीसीएल के कथारा ढोरी और बीएंडके एरिया सहित डीवीसी के बीटीपीएस, सीटीपीएस में विस्थापितों की लड़ाई का नेतृत्व किया. बीएंडके एरिया के कारो परियोजना में स्व सागर महतो के साथ 84 विस्थापितों को अपने हाथ से नियुक्ति पत्र बांटा था, जिसमें 45 विस्थापित करगली घुटियाटांड़ के थे. सांसद बनने के बाद बिनोद बाबू ने डीवीसी के बोकारो थर्मल पावर स्टेशन में विस्थापितों के आंदोलन का नेतृत्व करते हुए 788 विस्थापितों का पैनल बनवाया. आज भी डीवीसी प्रबंधन के साथ उनका किया गया एग्रीमेंट जीवित है. वर्ष 88-89 में बीएंडके एरिया के डीआरएंडआरडी में प्रबंधन ने 19 विस्थापितों को यह कह कर नौकरी से बैठा दिया था कि वह अपनी जमीन का समतलीकरण करा प्रबंधन को दें. इसके बाद बिनोद बाबू के आंदोलन का ही परिणाम था कि तत्कालीन जीएम बी अकला को सभी विस्थापितों को पुनः बुलाकर नियुक्ति पत्र देना पड़ा था. 80 के दशक में भंडारीदह स्थित एसआरयू के एक कर्मी राजाबेड़ा निवासी शिवचरण मांझी को प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया था. इसकी सूचना मिलने के बाद एके राय (अब स्व.) वहां पहुंचे, चूंकि उक्त मजदूर उन्हीं का यूनियन करता था. बाद में एके राय ने इस मामले को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी से एक पत्र लिखवा दिया था. बिनोद बाबू भंडारीदह के एसआरयू पहुंचे तथा तत्कालीन डीजीएम जेपी सुल्तानिया से सिर्फ एक ही सवाल किया कि शिवचरण का डिसमिल वापस होगा या नहीं ? कहते हैं कि श्री सुल्तानिया ने बिनोद बाबू से आग्रह करते हुए कहा कि तत्काल इसका डिसमिस वापस करते हुए स्थानांतरण हजारीबाग स्थित इकाई में कर देते हैं, लेकिन हाजिरी यहीं बन जायेगी.सीसीएल से कोल इंडिया तक मच गया था हड़कंप :
24 अप्रैल 1970 को बिनोद बाबू ने बेरमो कोयलांचल के लोगों को धीरे-धीरे संगठित व जागृत करने का काम शुरू किया. वह यहां एके राय के साथ बराबर आते रहते थे. वर्ष 1991 में जब बिनोद बाबू गिरिडीह के सांसद बने तो बेरमो के श्रमिक नेता शफीक खान (अब मरहूम) व बटोही सरदार के आग्रह पर बेरमो में माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद किया और ढोरी के कल्याणी में अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ बीच सड़क पर दो दिनों तक बगैर कुछ खाये-पीये बैठे रह गये थे. फिर क्या था, सीसीएल से लेकर कोल इंडिया तक में हड़कंप मच गया था. बिनोद बाबू कोयलांचल को माफिया मुक्त बनाना चाहते थे. बिनोद बाबू का बेरमो कोयलांचल के पुराने लोगों में शफीक खान, पूर्व विधायक स्व. शिवा महतो, पूर्व मंत्री स्व जगरनाथ महतो, बेनीलाल महतो, काशीनाथ केवट, बिनोद महतो, केशव सिंह यादव, संतोष आस, एके बनर्जी, भूली मियां, वरुण शर्मा, बैजनाथ केवट, काशीनाथ केवट, धनेश्वर महतो, मोहर महतो, काली ठाकुर, छठु महतो, बालदेव महतो, रतनलाल गौड़, बटोही सरदार, अक्षयवर शर्मा, स्व युगल किशोर महतो, हृदयनाथ भारती, रामेश्वर भुइयां, घनश्याम सिंह, खगपत महतो, दशरथ महतो, इंद्रदेव राम सहित कई लोगों के साथ काफी गहरा जुड़ाव था. इसमें रतनलाल गौड़ पर 50 से ज्यादा मुकदमा आंदोलन के दौरान दर्ज हुआ था.1977 में पहली बार गिरिडीह से लोस का लड़ा था चुनाव :
बिनोद बिहारी महतो ने 1977 में पहली बार गिरिडीह सीट से झामुमो के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन जनता पार्टी के रामदास सिंह से पराजित हो गये थे. इसके बाद 1980 में कांग्रेस के बिंदेश्वरी दुबे से और 1984 में कांग्रेस के सरफराज अहमद से हार गये. 1989 में पुन: भाजपा के रामदास सिंह से पराजित हो गये. अंतत: 1991 में चुनाव जीत कर बिनोद बाबू सांसद बने.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
