विटामिन-डी की कमी स्टील सिटी में बन रही नयी महामारी

बोकारो : डायबिटीज, बीपी, गैस के बाद अब स्टील सिटी बोकारो में ‘विटामिन डी’ की कमी एक महामारी का रूप लेती जा रही है. बोकारो के डॉक्टरों व विशेषज्ञों की मानें तो लोग बड़ी तेजी से विटामिन डी की कमी के शिकार हो रहे हैं. इसमें छह माह के बच्चे से लेकर 60 वर्ष के […]

बोकारो : डायबिटीज, बीपी, गैस के बाद अब स्टील सिटी बोकारो में ‘विटामिन डी’ की कमी एक महामारी का रूप लेती जा रही है. बोकारो के डॉक्टरों व विशेषज्ञों की मानें तो लोग बड़ी तेजी से विटामिन डी की कमी के शिकार हो रहे हैं. इसमें छह माह के बच्चे से लेकर 60 वर्ष के बुजुर्ग शामिल हैं.

आइएमएस-चास के अध्यक्ष डॉ रणधीर सिंह कहते हैं : मेरे पास आने वाले ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो विटामिन डी की कमी के चलते होने वाले दर्द व पीड़ा से जूझ रहे हैं. ऐसे मरीजों की संख्या 70 प्रतिशत है. यह सिर्फ बोकारो ही नहीं, पूरे देश की समस्या है. विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिए जरूरी होता है. इससे हड्डियों व मांसपेशियों को मजबूती मिलती है. इंटरनेशनल आस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन का अनुमान है कि भारत के शहरों में रहने वाले करीब 80 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी के शिकार हैं.

सामान्य स्तर 75 से 185 नैनोमोल्स प्रति लीटर- एनएमपीएल

डॉक्टरों के अनुसार, भारत में विटामिन डी का सामान्य स्तर 75 से 185 नैनोमोल्स प्रति लीटर- एनएमपीएल माना जाता है. हालांकि कुछ पैथोलॉजी लैब इसकी ऊपरी सीमा 200 एनएमपीएल मानते हैं. बदलते वक्त के साथ बढ़ी कामकाजी व्यस्तता होने, रहन-सहन के मौजूदा माहौल में सूरज की रोशनी के भी लग्जरी हो जाने और प्रदूषण के अलावा खुले शरीर को लेकर व्याप्त सामाजिक बुराइयों को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है.

धूप में कम लोग एसी में रहना अधिक पसंद कर रहे हैं. धूप से लोगों का संपर्क टूट गया है. भारत के लोगों की त्वचा में मौजूद मेलेनिन भी शरीर के भीतर विटामिन डी के समाहित होने को मुश्किल बना देता है. त्वचा में मेलेनिन का स्तर ही भारतीय की त्वचा का रंग भूरा बनाता है.

लक्षण हड्डियों का कमजोर होना व कैल्शियम की कमी

हड्डियों का कमजोर होना व कैल्शियम की कमी (आस्टियोपोरोसिस) विटामिन डी की कमी के मुख्य लक्षण हैं. बच्चों में इस बीमारी के लक्षण कहीं अधिक प्रत्यक्ष और चिंताजनक होते हैं, जैसे उनका विकास बाधित हो जाता है, हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, हाथ की कलाई या घुटना के पास उभार होना…

सदर अस्पताल बोकारो के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ एचडी सिंह ने कहा : बच्चों में दिखने वाले लक्षणों को आसानी से पहचाना जा सकता है, लेकिन बड़े-बुजुर्गों के मामले में लोग सुस्ती या कमजोरी को कसरत या शारीरिक गतिविधि की कमी मान लेते हैं. डॉ सिंह के अनुसार, बोकारो में विटामिन डी कमी का शिकार हर आयु वर्ग के लोग हैं.

मरीज के लक्षण व सोशल स्टेट्स के आधार पर इलाज

शरीर के भीतर विटामिन डी की कमी के बारे में जानने के लिए खून की कैल्सीफेडियोल या 25-हाइड्रॉक्सी विटामिन-डी या 125-हाइड्रॉक्सी विटामिन डी-3 जांच की जाती है. जांच काफी महंगी होती है. इसलिए आमतौर पर न तो डॉक्टर इसकी जांच लिखते हैं और न ही मरीज इस जांच को कराते हैं. आमतौर पर डॉक्टर मरीज के लक्षण व सोशल स्टेट्स के आधार पर ही इसका इलाज करते हैं.

हालांकि, मरीज की गंभीर स्थिति होने पर डॉक्टर जांच कराते हैं. आम तौर पर 25-हाइड्रॉक्सी विटामिन-डी जांच ही काफी होती है. डॉक्टर व विशेषज्ञों के अनुसार, खान-पान में लापरवाही भी इसका एक मुख्य कारण है. जागरूकता बहुत जरूरी है.

डॉक्टर की सलाह लिए बगैर दवाओं का सेवन नहीं करें

बहरहाल चबाने वाले टैबलेट, सैशे, कैप्सूल और सीरप के रूप में विटामिन-डी की दवा आती हैं. लेकिन, कभी भी डॉक्टर की सलाह लिए बगैर इन दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए. अगर जरूरत से ज्यादा विटामिन-डी ले लिया जाय तो यह विटामिन की कमी जितना ही नुकसानदायक हो सकता है. विटामिन-डी की विषाक्तता होने से खून में कैल्शियम की मात्रा बढ़ने या हाइपरकैल्शिमिया की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

इससे रोगी में उल्टी आने, मतिभ्रम, पेट में दर्द, अपच, दस्त, थकान, चक्कर आने और घबराहट जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं. यह उसके हृदय, लीवर व मस्तिष्क को भी प्रभावित कर सकता है. विटामिन-डी की अधिक मात्रा हड्डियों को भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर सकती है.

खाद्य उत्पादों को विटामिन-डी से लैस किया जाना चाहिए

विटामिन डी की अत्यधिक कमी को देखते हुए कुछ लोगों का यह मानना है कि दूध और चीज जैसे खाद्य उत्पादों को विटामिन-डी से लैस किया जाना चाहिए. डॉ रणधीर सिंह सिंह की मानें तो इस मामले में ऊपर से नीचे का नजरिया अपनाना सही होगा. वह कहते हैं : आयोडिन नमक की तरह सरकार को विटामिन-डी की बढ़ती समस्या के मामले में भी हस्तक्षेप करने की जरूरत है.

नमक में आयोडिन की मात्रा अनिवार्य किये जाने से आज इसकी कमी के मामले बहुत कम सामने आते हैं. इसी तरह का उपाय विटामिन-डी के मामले में भी करने की जरूरत है. हांगकांग, अमेरिका व ब्रिटेन जैसे देशों ने दूध और चीज जैसे उत्पादों में विटामिन-डी के अंश डालना जरूरी कर दिया है. भारत में भी यह होना चाहिए.

आइएमए ने जागरूकता के लिए ‘राइज एंड शाइन’ अभियान चलाया

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) ने भारतीय आबादी में विटामिन डी की बढ़ती समस्या के प्रति डॉक्टरों को जागरूक करने का जो फैसला किया था, उसके बाद से ही डॉक्टर अधिक संवेदनशील हुए हैं. आइएमए ने विटामिन डी कमी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए ‘राइज एंड शाइन’ अभियान चलाया था. यही वजह है कि अब डॉक्टरों ने सुस्ती या कमजोरी की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों को सामान्य तौर पर विटामिन डी-3 टेस्ट कराने के लिए कहना शुरू कर दिया है.

असल में मेडिकल समुदाय की चिंता बढ़ने की कुछ अहम वजह है. अक्सर विटामिन डी को कम करके आंका जाता है. लेकिन शरीर के भीतर इसकी खास भूमिका होती है. हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती देने के अलावा विटामिन डी शरीर में ऊर्जा के स्तर को बनाये रखता है. दिल की धमनियों को स्वस्थ रखता है, मस्तिष्क को सक्रिय रखता है व प्रजनन में भी योगदान देता है. इसके अलावा बीमारियों से लड़ने में शरीर को सबसे ताकतवर सुरक्षा देने वाली लाल रक्त कणिकाओं-आरबीसी का संश्लेषण भी करता है. इस तरह विटामिन डी शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी योगदान देता है.

डॉ रणधीर सिंह, अध्यक्ष-आइएमए, चास

सुबह सात से 11 बजे के बीच की धूप विटामिन डी के लिए लाभकारी

आम तौर पर विटामिन डी की कमी का शिकार महिलाएं अधिक होती हैं. खास तौर पर गर्भवती या रजोनिवृत्त या बुजुर्ग महिलाएं इसकी चपेट में जल्दी आती हैं. लेकिन, अब डॉक्टरों के पास आने वाले मरीजों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. इन मरीजों में 20-30 साल की उम्र के पुरुष भी शामिल होने लगे हैं. कभी-कभी तो छह महीने के नवजात बच्चे भी विटामिन डी की कमी के शिकार हो जा रहे हैं.

उसकी वजह यह है कि सूरज की रोशनी में बैठकर बच्चों की तेल मालिश करने की परंपरा खत्म हो चली है. विटामिन डी का सबसे बड़ा स्रोत सूरज की रोशनी है. इनसान के अलावा जानवर भी अपनी जरूरत लायक विटामिन डी सूरज की रोशनी में रहते हुए ही लेते हैं. खास बात यह है कि सुबह सात से 11 बजे के बीच की धूप इसके लिए अधिक लाभकारी होती है.

धूप सेंकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आपके शरीर का करीब 40 फीसदी हिस्सा खुला हो और कम-से-कम आधे घंटे तक धूप में बैठें. समस्या इस वजह से और बढ़ जाती है कि इस बीमारी का जल्दी पता भी नहीं चल पाता है. जब तक लक्षण साफ तौर पर न दिखने लगें, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता है.

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