प्रह्लाद चंद्र दास के कहानी संग्रह ‘आग ही आग’ पर परिचर्चा
बोकारो : हर कहानी में पात्र होता है. पात्र के अंदर-बाहर आग दहकती है. इसी आग को कहानी के जरिये पाठक तक पहुंचाने की कोशिश का नाम है ‘ आग ही आग.’ कहानी अंत तक पाठक को देशज अंदाज में बांधे रखती है. पात्रों की बात सहज देशी जबान में प्रस्तुत की गयी है. अंत चौकाने वाला है. यह बात साहित्यकार डॉ अली इमाम खान ने कही. वह बतौर मुख्य वक्ता बुधवार को सिटी सेंटर जेबी 20 में प्रह्लाद चंद्र दास (पीसी दास) के कहानी संग्रह ‘आग ही आग’ पर आयोजित परिचर्चा में बोल रहे थे.
दबाव और कसमसाहट : मुख्य वक्ता प्रो. डॉ बलभद्र ने कहा कि प्रह्लाद चंद्र दास की कहानी सामंती पूंजीवादी प्रवृत्ति व राजनीतिक दबाव के भीतर कसमसाते आम जन की प्रक्रिया व प्रतिक्रिया से उपजी है. कहानियों में आंचलिक भाषा का संतुलन ही कहानी को विशिष्ट बनाता है. कहानी अतीत की गरिमा को बखान करती है, ताकि वर्तमान को सुधार कर भविष्य को सुदृढ़ बनाया जा सके.
विसंगतियों की परतों का अनावरण : साहित्यकार भावना वर्मा ने कहा : प्रह्लाद चंद्र दास की कहानियों में विसंगतियों की परतें एक के बाद एक अनावृत्त होती जाती है. साथ ही समाज के ठेकेदारों के मुखौटे उतार कर खूंटियों पर टांग दिये जाते हैं. कहानियों में किस्सागोई की अद्भुत क्षमता दिखती है. भाषा का प्रवाह पाठक को कहानी से भटकने नहीं देता. पाठक चरित्र में स्वयं को जीने लगता है.
दबे-कुचलों की आवाज हैं कहानियां : अध्यक्षता करते हुए गोपाल प्रसाद ने ने कहा : संग्रह की कहानियां कथाकार की सशक्त रचनाशीलता का प्रमाण है. कहानी के माध्यम से शोषित, उपेक्षित, दबे-कुचले लोगों की आवाज को स्वर दिया गया है. हर बार कहानी आम लोगों के बीच से उठायी जाती है. इस कारण रुचि बरकरार रहती है. पाठक स्वयं को कहानी के आसपास ही पाता है.
कल्पना लोक नहीं यथार्थ की है कहानी : प्रह्लाद चंद्र दास ने कहा : कहानी के सभी पात्र, उनका अंतर्द्वंद्व, उनकी त्रासदी व विसंगति की पीड़ा, उनका संघर्ष
सब यथार्थ में घटित हो चुके हैं. यह कल्पना लोक की उपज नहीं है, यथार्थ
के कांटे की चुभन है. संग्रह की हर कहानी में अलग मुद्दा है, जो सार्थक प्रश्न चिह्न उठाता है. डॉ नर नारायण तिवारी, सरिता सिन्हा, संगीता चौधरी, ललन तिवारी, आकाश खूंटी, राम नारायण उपाध्याय, अरुण पाठक समेत कई साहित्यकार मौजूद थे.
तथ्य से सत्य की ओर जातीं कहानियां : उषा
साहित्यकार उषा झा ने कहा कि ‘आग ही आग’ की कहानियां अस्तित्व के लिए ही नहीं, बल्कि तथ्य से सत्य की ओर ले जाने वाली है. संघर्षशीलता ने नये सोच के साथ पात्रों के मन में सुलगती आग को नयी दिशा प्रदान की है. कुमार सत्येंद्र ने कहा : आग ही आग की कहानियां आमजन के जीवन संघर्ष को व्याख्यायित करती हैं. इसमें पूरा समाज विस्तार पाता है.
जनवादी लेखक संघ के डॉ मृणाल ने कहा : जिस तरह आचार्य शिवपूजन सहाय, प्रेमचंद व फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियां अपनी जमीन व परिवेश से जुड़ी रहती हैं, उसी प्रकार प्रह्लाद जी की कहानियां भी जुड़ाव पैदा करती हैं. देशज भाव में प्रस्तुति पाठक को कहानी में कैद कर लेती है.
