...ताकि भयमुक्त और कष्टरहित हो मृत्यु

उपलब्धि. अंतिम दिनों की भी योजना बनाने के लिए प्रेरित करती डॉ अभिजीत दाम की पुस्तक बसंत मधुकर बोकारो : हम सभी आम तौर पर अपने जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी हर घटना-परिस्थिति की योजना अपने सोच और सामर्थ्य के मुताबिक बनाते हैं. पर मृत्यु को अवश्यंभावी मानने की भारतीय अवधारणा के कारण कभी भूल कर […]

उपलब्धि. अंतिम दिनों की भी योजना बनाने के लिए प्रेरित करती डॉ अभिजीत दाम की पुस्तक
बसंत मधुकर
बोकारो : हम सभी आम तौर पर अपने जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी हर घटना-परिस्थिति की योजना अपने सोच और सामर्थ्य के मुताबिक बनाते हैं. पर मृत्यु को अवश्यंभावी मानने की भारतीय अवधारणा के कारण कभी भूल कर भी हम अपने अंतिम दिनों को लेकर कोई प्लानिंग नहीं सोचते.
इस दृष्टि से डॉ अभिजीत दाम की पुस्तक ‘मृत्यु’ भारतीय जन-मानस के लिए बहु उपयोगी है. यह किताब अंतिम दिनों में व्यक्ति के सोच, मरणासन्न व्यक्ति के प्रति परिवार-समाज का रुख, उसकी जरूरतों और परिस्थितियों को केंद्र में रखकर अंतिम दिनों की भी योजना बना लेने को प्रेरित करती है .
मान्यता पर छायी धुंध के खिलाफ एक प्रयास : पढ़ाई, कॅरियर, शादी, मकान, बच्चे, फिर उनकी पढ़ाई-शादी से लेकर उनके बच्चों तक योजनाओं का अंतहीन क्रम चलता रहता है. आपने शायद ही सुना हो कि किसी आम इंसान ने अपनी मृत्यु को लेकर कभी कोई योजना बनायी हो.
डॉ दाम की पुस्तक मान्यता पर छायी धुंध को छाटने के खिलाफ एक सार्थक प्रयास के रूप में लिया जाता है. ग्रामीण भारत में पैलेटिव केयर मूवमेंट के अग्रणी व बोकारो जेनरल हॉस्पिटल में एनेस्थेटिस्ट डॉ दाम ने मृत्यु की प्राचीन वैदिक व बौद्ध अवधारणाओं को समेटते हुए अपनी इस पुस्तक में मृत्यु से जुड़े भय को लोगों के मन से दूर करने का प्रयास किया है. इसके लिए अंतिम दिनों की योजना बनाने की वकालत की है.
मृत्यु को वरण करने को तैयार करते हैं 111 पन्ने : पावर पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित एक सौ ग्यारह पन्नों की इस पुस्तक में बदले हुए नाम-पतों वाले दर्जनों मरीजों का संदर्भ लेते हुए डॉ दाम ने मृत्यु के बाद की अवधारणा और जीवन के आध्यात्मिक पहलू पर भी प्रकाश डाला है. डॉ दाम कहते हैं कि असाध्य रोगों से पीड़ित मरणासन्न मरीजों की दशकों से देखभाल करने के दौरान अनुभव हुआ कि अंतिम दिनों में अधिकतर लोग धीरे-धीरे समाज और परिवार से भी उपेक्षित होने लगते हैं. तब उनकी जरूरतें तो बिल्कुल सीमित हो जाती हैं, लेकिन उनकी सारी जरूरतें रु से पूरी नहीं हो सकती.
ऐसे वक्त में उन्हें इलाज व सेवा के अतिरिक्त जरूरी मानसिक शांति अध्यात्म से ही मिलती है. इसी आध्यात्मिक ज्ञान से लोगों के मन में घर कर बैठा ‘मृत्यु’ का भय दूर होता है. अपनी मृत्यु की योजना बनाने की बात सुनने में भले अटपटी लगे, पर मृत्यु एक अटल सत्य है. इसलिए ‘मृत्यु’ के लेखक के अनुसार अंतिम दिनों के लिए भी योजना होनी चाहिए, ताकि मृत्यु भयमुक्त और कष्ट रहित हो.

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