Bihar Flood News : एक तरफ पटना का चमचमाता जेपी गंगापथ और दूसरी तरफ उसी सड़क के किनारे त्रिपाल के नीचे जिंदगी गुजारते बाढ़ पीड़ित परिवार. राजधानी में बाढ़ की यह तस्वीर विकास और बेबसी के बीच का बड़ा फर्क दिखाती है. जिन लोगों के घर पानी में डूब गए, उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षित जगह पर रहना, बच्चों को संभालना और खाने-पीने की व्यवस्था करना है. कई परिवारों ने सड़क किनारे पन्नी और त्रिपाल टांगकर अस्थायी आशियाना बना लिया है. कहीं बच्चे जमीन पर सो रहे हैं तो कहीं चौकी पर परिवार रात काट रहा है. इसी जगह पर मवेशियों को भी बांधकर रखा गया है और वहीं खाना भी बनाया जा रहा है.
घर डूबे तो सड़क किनारे बना लिया आशियाना
बाढ़ के पानी से प्रभावित परिवारों ने बताया कि पानी बढ़ने के बाद उन्हें अपना घर छोड़कर ऊंची जगहों की ओर आना पड़ा. कोजी बन टोली और दीघा क्षेत्र से आए कुछ परिवार फिलहाल जेपी गंगापथ के किनारे रह रहे हैं. किसी ने त्रिपाल के सहारे जगह बनाई है तो किसी ने कपड़े और अन्य सामान से अस्थायी छत तैयार की है.
महिलाओं का कहना है कि घर में पानी भर जाने के बाद बच्चों और जरूरी सामान के साथ यहां आना मजबूरी बन गया. त्रिपाल के नीचे परिवार का रहना आसान नहीं है, लेकिन उनके पास दूसरा विकल्प भी नहीं है.
एक ही जगह खाना, रहना और बच्चों की नींद
अस्थायी ठिकानों की स्थिति बेहद मुश्किल है. एक ही जगह पर परिवार खाना बना रहा है, बच्चे सो रहे हैं और मवेशियों को भी बांधा गया है. कहीं बच्चों के लिए चौकी की व्यवस्था है तो कई बच्चे जमीन पर ही सोने को मजबूर हैं.
बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि दिन में धूप और रात में बारिश के बीच त्रिपाल के नीचे रहना काफी कठिन हो जाता है. छोटे बच्चों और बुजुर्गों की परेशानी और बढ़ जाती है.
खाने के लिए भीड़, हर परिवार को भरपेट भोजन नहीं
बाढ़ प्रभावित परिवारों के मुताबिक प्रशासन की ओर से भोजन की व्यवस्था की गई है, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने के कारण सभी को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है. एक महिला ने बताया कि कई बार खाना लेने के लिए काफी दूर तक जाना पड़ता है.
उनके अनुसार भीड़ अधिक होने पर परिवार के सभी सदस्यों के हिसाब से भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में लोग एक समय का खाना लेने के बाद बाकी समय खुद रोटी या दूसरी चीजें बनाकर गुजारा कर रहे हैं.
एक महिला ने बताया कि पिछले दिन रात करीब एक बजे तक खाना मिला था. दूसरे दिन भी भोजन की व्यवस्था हुई, लेकिन दूरी और भीड़ के कारण कई लोग खाना लेने नहीं जा सके.
महिलाओं और बच्चों के लिए शौचालय की बड़ी समस्या
बाढ़ के बीच अस्थायी शिविरों में रहने वाले लोगों के सामने शौचालय की समस्या भी गंभीर है. घरों में पानी भर जाने के बाद आसपास खुले में जाने की स्थिति बन गई है.
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से आसपास के स्कूलों को खोलने की मांग की है, ताकि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए कम से कम शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो सके. उनका कहना है कि बाढ़ के दौरान यह रोजमर्रा की सबसे बड़ी परेशानियों में से एक बन गई है.
मवेशियों के लिए भी संकट, चारे का इंतजाम मुश्किल
बाढ़ का असर सिर्फ इंसानों पर नहीं, बल्कि मवेशियों पर भी पड़ा है. सड़क किनारे बने अस्थायी ठिकानों में परिवारों के साथ बकरियां और अन्य मवेशी भी रखे गए हैं.
पीड़ितों का कहना है कि मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था भी चुनौती बनी हुई है. कुछ लोगों को प्रशासन की ओर से सीमित मात्रा में चारा मिलने की बात कही गई, लेकिन लगातार बढ़ती जरूरत के बीच यह पर्याप्त नहीं है.
हर साल बाढ़, स्थायी समाधान की मांग
बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि हर साल उन्हें इसी तरह की परेशानी से गुजरना पड़ता है. कुछ लोगों ने बताया कि बाढ़ आने के बाद घर छोड़कर ऊंची जगह पर जाना उनकी मजबूरी बन जाती है.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिनके पास जमीन और संसाधन हैं, उनके लिए व्यवस्था अलग है, जबकि गरीब परिवारों को अस्थायी ठिकानों में रहना पड़ता है. लोगों ने सरकार से बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान निकालने की मांग की है.
बाढ़ पीड़ितों ने प्रशासन से की मदद की अपील
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से सिर्फ आश्वासन के बजाय जमीन पर राहत पहुंचाने की मांग की है. उनकी प्रमुख मांगों में पर्याप्त भोजन, पीने का साफ पानी, त्रिपाल, अस्थायी शौचालय, बच्चों के लिए सुरक्षित जगह और मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था शामिल है.
बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि कुछ दिनों की बाढ़ उनके लिए पूरे साल की कमाई और मेहनत पर भारी पड़ती है. घर और सामान डूबने के बाद सड़क किनारे जिंदगी शुरू करना उनके लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है.
जेपी गंगापथ के किनारे दिखी बाढ़ की दो तस्वीरें
पटना की बाढ़ की यह तस्वीर राजधानी के दो अलग-अलग चेहरों को सामने लाती है. एक तरफ जेपी गंगापथ की चमचमाती सड़क है, वहीं दूसरी तरफ उसी सड़क के किनारे त्रिपाल के नीचे जिंदगी गुजारते परिवार हैं.
किसी के पास चौकी है तो कोई जमीन पर सो रहा है. कहीं बच्चे सो रहे हैं, वहीं पास में मवेशी बंधे हैं और कुछ दूरी पर खाना बनाया जा रहा है. बाढ़ के बीच इन परिवारों की जिंदगी यह सवाल खड़ा करती है कि राहत और पुनर्वास की व्यवस्था इन लोगों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच पा रही है.