बदहाल. बाजार समिति प्रांगण हुआ वीरान, किसान परेशान

संपत्ति अरबों की, लेकिन उपयोगिता हो गयी शून्य किसानों को उनके उत्पाद की सही कीमत और बिचौलियों से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना हुई थी. दो दशक पहले जब यहां परिसर भवन और मार्केट का निर्माण हुआ तो जिले के किसानों को काफी खुशी हुई थी. 1996-97 से शुरू […]

संपत्ति अरबों की, लेकिन उपयोगिता हो गयी शून्य

किसानों को उनके उत्पाद की सही कीमत और बिचौलियों से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना हुई थी. दो दशक पहले जब यहां परिसर भवन और मार्केट का निर्माण हुआ तो जिले के किसानों को काफी खुशी हुई थी. 1996-97 से शुरू होने के बाद अगले कुछ सालों में ही यह किसानों की मंडी चमक उठी थी.
पर 2006 में यह व्यवस्था बंद होने के बाद यह उजाड़ और वीरान हो गयी. बाजार समिति समाप्त होने का नतीजा है कि बिचौलिये फिर हावी हो गये. किसान अपने उत्पाद को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर बेचने को बाध्य हो गये. अरबों रुपये की परिसंपत्ति लावारिश हालत में पड़ी है, जिसे देखने वाला कोई नहीं है. बाजार समिति परिसर की जितनी जमीन है, इसकी कीमत दो से ढाई अरब रुपये है. परिसर का दिन-ब-दिन अतिक्रमण हो रहा है. परिसर में बनाये गये मार्केट शेड, दुकानें और समिति का प्रशासनिक भवन, सबके सब बदहाल हैं.
लगभग 32 एकड़ के भूखंड पर स्थापित बाजार समिति की हालत हो रही बदतर
अरबों रुपये की परिसंपत्ति लावारिस हालत में हो रही बरबाद
मार्केट शेड, दुकानें और समिति का प्रशासनिक भवन, सबके सब बदहाल
वर्ष 1996-97 में शुरू होने के बाद किसानों की यह मंडी चमक उठी थी
2006 में यहां व्यवस्था बंद होने के बाद यह हो गयी वीरान
हाजीपुर : कभी किसानों और व्यापारियों से गुलजार रहने वाली बाजार समिति का परिसर आज पशुओं का चरागाह बन कर रह गया है. नगर के जढुआ रोड स्थित कृषि उत्पादन बाजार समिति की बदहाली देख तरस आती है. लगभग 32 एकड़ के भूखंड पर स्थापित बाजार समिति की हालत यह है कि अब यहां न किसान अपना उत्पाद बेचने आते हैं और न बाहर के खरीदारी पहुंचते हैं. किसानों के हित में स्थापित की गयी यह विशाल मंडी आज एक ऐसा उजड़ा हुआ बाजार है,
जो भैंस के तबेले में तब्दील होता जा रहा है. अरबों रुपये की परिसंपत्ति लावारिस हालत में पड़ी है, जिसे देखने-सुनने वाला कोई नहीं है. बाजार समिति परिसर की जितनी जमीन है, इसकी कीमत दो से ढाई अरब रुपये है. परिसर का अतिक्रमण होते जा रहा है. बाजार समिति की चहारदीवारी भी सलामत नहीं रही. परिसर में बनाये गये मार्केट शेड, दुकानें और समिति का प्रशासनिक भवन, सब बदहाल हैं.
बाजार समिति के बंद होने से बिचौलियों की पौ बारह : किसानों को बिचौलियों से बचाने, बाजार उपलब्ध कराने और उनके उत्पाद की सही कीमत दिलाने के उद्देश्य से कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना हुई थी. दो दशक पहले जब यहां परिसर भवन और मार्केट का निर्माण हुआ तो जिले के किसानों को काफी खुशी हुई थी. किसानों को लगा कि अब उन्हें अपना उत्पाद बेचने के लिए न सिर्फ एक मुफीद मंडी मिलेगी, बल्कि उत्पाद का सही मूल्य भी मिल सकेगा.
1996-97 से बकायदे शुरू होने के बाद अगले कुछ सालों में ही यह किसानों की मंडी चमक उठी थी. 2006 में यह व्यवस्था बंद होने के बाद यह उजाड़ और वीरान हो गयी. बाजार समिति समाप्त होने का नतीजा है कि बिचौलिए फिर हावी हो गये. जहां-तहां मंडियां खोल ली गयीं और किसान अपने उत्पाद को औने-पौने दाम पर बेचने को बाध्य हो गये. इस तरह हजारों किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया.
मछली मंडी में मवेशियों के साथ जमे अतिक्रमणकारी : बाजार समिति परिसर में फल, सब्जियों के अलावा मछली आढ़त का भी निर्माण कराया गया था. परिसर के एक तरफ स्थापित मछली मंडी में लगभग बीस दुकानें बनायी गयीं. आज एक भी दुकान आबाद नहीं है. मछली मंडी के सभी बरामदे अतिक्रमणकारियों के कब्जे में हैं. यहां लोगों ने पशुओं के साथ बसेरा बना लिया है. यहां की मछली मंडी में बाहर से मछलियां लाने के लिए सरकार ने बाजार समिति को वातानुकूलित वाहन उपलब्ध कराये थे. करोड़ों के ये वाहन आज परिसर में खड़े सड़ रहे हैं. चलंत जनता दुकान के लिए लाये गये वाहन का भी यही हाल है. केला पकाने वाला यंत्र भी जंग खा रहा है.
खटाई में पड़ गयी प्लिंग कूलिंग चेंबर की योजना : बाजार समिति में फलों के रख -रखाव और उन्हें अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए प्लिंग कूलिंग चेंबर के निर्माण की योजना बनी थी. लगभग डेढ़ दशक पहले तत्कालीन केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री हुकुमदेव नारायण यादव ने इसका शिलान्यास भी किया था. बाजार समिति के बंद होने के साथ ही यह योजना भी अधर में है. पीसीसी का निर्माण होने से जिले के आम, लीची, केला, अमरूद आदि फलों का उत्पादन करने वाले किसानों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे अपने उत्पाद को ज्यादा दिनों तक टिकाऊ बना कर रख सकते थे.
कहते हैं पूर्व अध्यक्ष
बाजार समिति के बंद होने से जिले के किसानों का विकास बाधित हो गया. बाजार समिति को छोड़ कर जिले और राज्य में किसानों के लिए कोई मंडी नहीं थी. श्री यादव बताते हैं कि बाजार समिति की सकल आय का 40 प्रतिशत हिस्सा किसानों के विकास पर खर्च होता था. इनमें किसानों के आवागमन के लिए पहुंच पथ का निर्माण, पेयजल के लिए चापाकल लगाने, रोशनी के लिए लाइट लगाने और हाट बाजार का निर्माण आदि कार्य शामिल थे.
जिले के किसानों को समय-समय पर राज्य के बाहर भेज कर प्रशिक्षण दिलाया जाता था. किसानों के हित में बाजार समिति की बड़ी उपयोगिता थी. किसान चाहते हैं कि यह फिर से शुरू हो.
उपेंद्र प्रसाद यादव, पूर्व अध्यक्ष बाजार समिति

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