लालगंज नगर : लालगंज प्रखंड क्षेत्र के घटारो में नारायणी नदी से सटे महज एक किमी की दूरी पर स्थित रउजा और डीह की अनोखी दास्तान यहां के ऐतिहासिक महत्व को सामने लाती है. लिच्छवि राजवंश की धरती वैशाली का घटारों गांव कई ऐतिहासिक तथ्यों को अपने अंदर समेटे हुए है.
घंटारव से हुआ घटारो : जानकारों के अनुसार ऐसा कोई ऐतिहासिक साक्ष्य तो उपलब्ध नहीं है लेकिन प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार घटारो मूल शब्द घंटारव का अपभ्रंश है. कभी वैशाली के लिच्छवि राजवंश से प्रत्यक्ष संबंध घटारो से हुआ करता था. पूर्व में लगे घंटे को सीधे वैशाली से बजाकर तत्कालीन शासक द्वारा किसी सूचना को यहां तक पहुंचायी जाती थी.
पुनः आवश्यकतानुसार उस सूचना को आगे हस्तगत किया जाता था. उस समय उसी ध्वनि के कारण इस गांव का नाम घंटारव पड़ा. जो कि कालान्तर में घटारो के नाम से प्रसिद्ध हो गया. रउजा के बारे में ऐसी धारणा है कि वहां से वैशाली तक कभी सुरंग जाती थी. इसी के इर्द गिर्द आज के लालगंज का बाजार भी हुआ करता था, जिसे डीह कहा जाता था. यहां पर सघन बस्ती थी. पूर्व काल में वैशाली जाने का गुफा हुआ करता था, जो तकरीबन दस कट्ठे में है और जिसकी ऊंचाई जमीन से 20 फुट ऊपर है. यदि रउजा की खुदाई की जाये तो इस रहस्य से पर्दा उठ जायेगा. गुमनामी के अंधेरे में खोये इस स्थल को वैशाली से जोड़कर इसकी खोजबीन करने की जरूरत है, जिससे प्राचीन घंटारव की कृति और बढ़ सकती है.
महात्मा गांधी रुके थे यहां : लोगों का मानना है कि नारायणी नदी के तट पर प्रसिद्ध महात्मा कृत बाबा रहा करते थे. उनके समय में सैकड़ों गाय स्वच्छंद रूप से विचरण किया करती थीं.
चंपारण यात्रा के दौरान महात्मा गांधी यहां रुके थे, जिस स्थल को आज भी गांधी आश्रम के नाम से जाना जाता है. घटारो की धरती ने महावीर प्रसाद शर्मा विप्लव जैसे कवि को जना है, जिनकी पंक्तियां हाजीपुर रेलवे स्टेशन की दीवार पर अंकित हैं. साथ ही कई स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय स्तर के तबला वादक महापुरुष की जन्मस्थली घटारो ही है.
