सुपौल. मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान केवल पर्व-त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकगीतों और लोकधुनों में भी इसकी आत्मा बसती है. फगुआ के रंगों के बीच आज भी मिथिलांचल में एक और परंपरा पूरे रस और उत्साह के साथ सुनाई देती है चैतावर गीत. आधुनिकता और डिजिटल संगीत के इस दौर में भी चैतावर का क्रेज कम नहीं हुआ है, बल्कि यह नई पीढ़ी के बीच भी अपनी जगह बनाए हुए है. चैत माह में गाए जाने वाले चैतावर गीत प्रकृति, प्रेम, विरह और सामाजिक जीवन के भावों को सरल लेकिन गहरे अंदाज में व्यक्त करते हैं. सुपौल जिले के ग्रामीण इलाकों में जैसे ही फगुआ की मस्ती थमती है, वैसे ही ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम के साथ चैतावर की मधुर तान गूंजने लगती है. खेत-खलिहान, आंगन और चौपाल हर जगह इन गीतों की स्वर-लहरियां माहौल को जीवंत बना देती हैं. चैतावर गीतों की खासियत यह है कि इनमें लोकजीवन की सच्ची तस्वीर झलकती है. पति के परदेस जाने का दर्द, ससुराल में नायिका की व्यथा, या फिर बसंत के आगमन की खुशी हर भाव को गीतों में बड़ी सहजता से पिरोया जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि पहले रात के समय महिलाएं समूह बनाकर चैतावर गाती थीं, और पूरा गांव श्रोताओं से भर जाता था. चैतावर के कुछ लोकप्रिय बोल आज भी लोगों की जुबान पर हैं. जिसमें “चैत मास आयल सजन, मोर जिया घबराय, पिया बिना सूना लागे, कागा बोलि जाय.” एक अन्य चैतावर गीत में नारी मन की पीड़ा झलकती है.“सासु ननदिया ताने देवे, पिया गइल परदेस, चैतावर गावे सखिया, हल्का होवे कलेस.”आज भले ही मोबाइल और सोशल मीडिया का जमाना हो, लेकिन चैतावर ने खुद को समय के साथ ढाल लिया है. कई युवा कलाकार पारंपरिक चैतावर को नए वाद्य यंत्रों और रिकॉर्डिंग के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं. यूट्यूब और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चैतावर गीतों को लाखों लोग सुन रहे हैं, जिससे यह परंपरा और भी व्यापक होती जा रही है. सुपौल के सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि चैतावर केवल गीत नहीं, बल्कि मिथिलांचल की लोक-स्मृति है. यह पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम है. गांव की बुजुर्ग महिलाएं जहां इसे परंपरा मानकर निभा रही हैं, वहीं युवा इसे अपनी पहचान के रूप में अपना रहे हैं. फगुआ की उमंग के साथ चैतावर की मधुरता यह साबित करती है कि आधुनिकता चाहे जितनी भी तेज हो, मिथिलांचल की लोकसंस्कृति आज भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई है.
फगुआ की मस्ती में घुली चैतावर की मिठास, आधुनिक दौर में भी मिथिलांचल की परंपरा जिंदा
खेत-खलिहान, आंगन और चौपाल हर जगह इन गीतों की स्वर-लहरियां माहौल को जीवंत बना देती हैं
