भारत माता की आजादी की लड़ाई में बिहार के सुपौल जिले का स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास रहा है. देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए यहां के वीर सपूतों ने बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया. बात जब महात्मा गांधी के 'नमक आंदोलन' की आती है, तो सुपौल का 'कर्णपुर' गांव आजादी के मतवालों का मुख्य केंद्र बनकर उभरा था. आइए, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जानते हैं सुपौल के उन गुमनाम नायकों की कहानी, जिनके संघर्षों ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं.
कोसी का कछार बना था क्रांतिकारियों की सुरक्षित पनाहगाह
महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी तक करीब 200 मील की पैदल यात्रा कर नमक कानून तोड़ा था. गांधीजी के इस एक कदम ने पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना की ऐसी लहर दौड़ाई कि सुपौल भी इससे अछूता नहीं रहा. उस दौर में सुपौल जिला आजादी के दीवानों से भरा हुआ था. कोसी नदी के कछार और दुर्गम जंगलों के कारण यह इलाका क्रांतिकारियों के छिपने और रणनीति बनाने के लिए काफी अनुकूल माना जाता था. दुर्गम भौगोलिक स्थिति के चलते अंग्रेजी सिपाहियों के लिए यहां आंदोलनकारियों को खोजना लोहे के चने चबाने जैसा था.
कर्णपुर में टूटा नमक कानून, हनुमान घाट बना गवाह
गांधीजी से प्रेरित होकर तत्कालीन भागलपुर (अब सुपौल) के कर्णपुर गांव में नमक कानून तोड़ने का ऐतिहासिक शंखनाद हुआ. कर्णपुर में दो प्रमुख जगहों— कर्णपुर-मल्हनी सड़क किनारे स्थित 'हनुमान घाट' और गजना नदी के किनारे 'कलम बाग' में स्वयंसेवकों ने नमक बनाकर अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी.
हनुमान घाट पर इस बड़े आंदोलन का नेतृत्व प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र मिश्र उर्फ 'राजाबाबू' ने किया. भीषण गर्मी की परवाह किए बिना हजारों लोग उनके पीछे सड़कों पर उतर आए और अंग्रेजों के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया.
लाठियां खाईं और यातनाएं सहीं, लेकिन नहीं झुके सुपौल के वीर
अंग्रेजों की बर्बरता और लाठियां सुपौल के वीरों का हौसला नहीं तोड़ सकीं. इस आंदोलन में शत्रुध्न प्रसाद सिंह, यमुना प्रसाद सिंह, रामबहादुर सिंह, चितनारायण शर्मा, शिवनारायण मिश्र और गंगा प्रसाद सिंह जैसे नायकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लहटन चौधरी और चंद्रकिशोर पाठक सहित सैकड़ों स्वयंसेवकों ने इस आंदोलन को जमीनी मजबूती प्रदान की.
जिले के हर कोने से रणबांकुरों ने अपना योगदान दिया. कर्णपुर के शिवनारायण मिश्र (लाल बाबाजी), खुबलाल मेहता, सुखपुर के रामेश्वर झा, जदिया के सखीचंद मंडल व कुंजीलाल यादव, निर्मली के रशिकलाल, डपरखा के सरोवर मंडल, त्रिवेणीगंज के सुरेश्वर पांडेय और सरायगढ़ के रामदेव गुप्ता समेत सैकड़ों वीर सपूतों ने भयानक यातनाएं सहीं, लेकिन स्वतंत्रता के अपने लक्ष्य से एक इंच भी पीछे नहीं हटे.
वीर सपूतों को सलाम: आज भी प्रेरणा देता है स्मृति स्तंभ
सुपौल के प्रखंड कार्यालय परिसर में स्थापित स्मृति स्तंभ आज भी उन महान स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तपस्या और बलिदान की गवाही देता है. इन अमर सपूतों ने अपने वर्तमान और सुख-चैन की परवाह किए बिना, हमारे सुरक्षित भविष्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर जिले के इन तमाम वीर सेनानियों को याद करना और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करना ही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है.
