मधुश्रावणी व्रत शुरू, पहले दिन शिव-पार्वती की हुई पूजा

नवविवाहिताओं की आस्था, परंपरा व प्रकृति से जुड़ा अनुपम पर्व है मधुश्रावणी

: नवविवाहिताओं की आस्था, परंपरा व प्रकृति से जुड़ा अनुपम पर्व है मधुश्रावणी सुपौल/ बलुआ बाजार. मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाला पर्व मधुश्रावणी व्रत मंगलवार को पूरी श्रद्धा, परंपरा व उल्लास के साथ शुरू हुआ. नवविवाहिताओं द्वारा किया जाने वाला यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी उदाहरण है. व्रत के प्रारंभिक दिनों से ही नवविवाहिता के ससुराल पक्ष द्वारा पूजन सामग्री और प्रतिदिन सूर्यास्त से पूर्व की भोजन सामग्री भेजी जाती है. ससुराल पक्ष इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि पूजा में किसी प्रकार की कोई कमी न रह जाए. यह परंपरा नवविवाहिताओं के लिए ससुराल के सम्मान और प्रेम का प्रतीक मानी जाती है. अंकुरी”” बांटने की परंपरा व पूजन के बाद आनंद व्रत के पहले और अंतिम दिन अंकुरी”” बांटने की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें व्रती समाज और परिवार के लोगों को अंकुरित अनाज (अंकुरी) बांटती हैं. यह परंपरा सामूहिकता और शुभकामना के संदेश को फैलाती है. पूजन उपरांत नवविवाहिताएं अपनी सहेलियों के साथ गांव के मंदिरों और बगीचों में जाकर फूल-पत्ते चुनने निकलती हैं, जिससे वे इस तपस्वी व्रत में भी आनंद का अनुभव करती हैं. अंतिम दिन होता है विशेष पूजन पूजा के अंतिम दिन नवविवाहिता के ससुराल से विशेष रूप से पूजन सामग्री, मिष्ठान, नए वस्त्र और पांच बुजुर्गों को भेजा जाता है. ये बुजुर्ग आकर नवविवाहिता को आशीर्वाद देते हैं, और आशीर्वाद ग्रहण कर ही व्रत की पूर्णाहुति होती है. इस दिन विशेष विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न की जाती है और समूह में महिलाएं भक्ति गीत गाती हैं, जिससे वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक बन जाता है. अखंड दीपक व कथा वाचन की परंपरा पूजा स्थल पर अखंड दीपक जलता रहता है, जो श्रद्धा और निरंतर साधना का प्रतीक होता है. प्रतिदिन कथा वाचिका द्वारा शंकर-पार्वती के गृहस्थ जीवन से जुड़ी कथाएं नवविवाहिताओं को सुनाई जाती हैं. इस दौरान व्रती नए वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित होकर विधिपूर्वक पूजा करती हैं. मधुश्रावणी पर्व की एक विशिष्टता यह भी है कि यह प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है. राधिका झा ने बताया कि व्रत के दौरान ताजे फूल-पत्ते नहीं तोड़े जाते, बल्कि पेड़ से गिरे हुए फूल-पत्तों का ही उपयोग पूजा में किया जाता है. सावन में वृक्षों से फूल-पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी इस परंपरा में निहित है. महिला पंडित कराती हैं अनुष्ठान इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसमें पूरे अनुष्ठान की अगुवाई महिला पुरोहित ही करती हैं. सुपौल की पंडित वीणा झा के अनुसार, इस पूजा में महिला पंडित की भूमिका अहम होती है क्योंकि एक महिला ही दूसरी महिला के भाव, आचार-विचार और जीवन शैली को गहराई से समझ सकती है. इतना ही नहीं, पूजा के दौरान मैथिली में कुछ पारंपरिक दोहे (स्थानीय भाषा में जिन्हें “फकरा ” कहा जाता है) भी गाए जाते हैं, जिन्हें पुरुषों द्वारा बोलना या उच्चारण करना असहज माना जाता है. यही कारण है कि यह पूजा पूरी तरह से महिलाओं के द्वारा और महिलाओं के लिए होती है. पारंपरिक मान्यताओं से जुड़ा है पर्व मधुश्रावणी पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. यह नवविवाहित महिलाओं को न केवल पारिवारिक जिम्मेदारियों से जोड़ता है बल्कि मिथिलांचल की समृद्ध परंपराओं से भी उनका परिचय कराता है. मधुश्रावणी पंचमी केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान भी है. यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि यह महिला सशक्तीकरण का भी प्रतीक है, जहां महिला पुरोहित की भूमिका को समाज स्वीकार कर आगे बढ़ाता है.

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