Aaj Ka Darshan: सुपौल कुनौली से मनीष सिंह की रिपोर्ट — इंडो-नेपाल सीमा क्षेत्र के कुनौली वार्ड संख्या-16 स्थित श्री श्री 108 मां कुणालेश्वरी महिषमर्दिनी भगवती मंदिर में रोजाना श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. सीमावर्ती इलाके में स्थित यह मंदिर वर्षों से लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि मां कुणालेश्वरी अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं.
सुबह-शाम गूंजता है भक्तिभाव का माहौल
मंदिर परिसर में सुबह की आरती से लेकर शाम की पूजा तक भक्तों की भीड़ बनी रहती है. श्रद्धालु पूरे विधि-विधान और भक्तिभाव के साथ मां अष्टभुजी दुर्गा की पूजा करते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि मां की कृपा से क्षेत्र में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है.
मंदिर की विशेषता यह है कि यहां आने वाले भक्तों में सीमावर्ती नेपाल के श्रद्धालुओं की संख्या भी काफी अधिक रहती है. कई श्रद्धालु लंबी दूरी तय कर माता के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं.
नवरात्र में दिखता है भक्ति का विराट स्वरूप
वैसे तो पूरे साल मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही लगी रहती है, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां का दृश्य बेहद खास हो जाता है. इस दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, अनुष्ठान और दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है. हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
भक्तों का विश्वास है कि मां कुणालेश्वरी के दर्शन मात्र से दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है. यही वजह है कि सामान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ कम नहीं होती.
कोशी रिंग बांध की खुदाई में मिली थी मां की प्रतिमा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुनौली-निर्मली कोशी रिंग बांध की खुदाई के दौरान मां की प्रतिमा प्राप्त हुई थी. इसके बाद ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया. 26 जनवरी 1989 को विधिवत मां की प्रतिमा की स्थापना की गयी थी.
मंदिर के पुजारी मुन्ना ठाकुर बताते हैं कि मां कुणालेश्वरी महिषमर्दिनी भगवती के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता. श्रद्धालुओं को यहां मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है.
धार्मिक पर्यटन के रूप में बढ़ रही पहचान
सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित यह मंदिर अब धार्मिक पर्यटन के रूप में भी अपनी अलग पहचान बना रहा है. यहां आने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ स्थानीय संस्कृति और आध्यात्मिक वातावरण का भी अनुभव करते हैं.
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