आलू की खेती पर मौसम की मार, बोआई प्रभावित

प्रखंड में इस वर्ष आलू की खेती में कमी देखी जा रही है. आलू की बोआई अक्टूबर से शुरू हो जाती है. लेकिन खेत गीला रहने के कारण समय पर खेत की जुताई नहीं हो पाई. इससे बोआई में देर हो गई. देर से आलू बोने में ठंड और पाला का असर अधिक होता है. इससे उपज में कमी आ जाती है. इसे देखते हुए किसान लोग आलू की जगह पर दूसरे फसल लगा रहे हैं.

प्रतिनिधि, महाराजगंज. प्रखंड में इस वर्ष आलू की खेती में कमी देखी जा रही है. आलू की बोआई अक्टूबर से शुरू हो जाती है. लेकिन खेत गीला रहने के कारण समय पर खेत की जुताई नहीं हो पाई. इससे बोआई में देर हो गई. देर से आलू बोने में ठंड और पाला का असर अधिक होता है. इससे उपज में कमी आ जाती है. इसे देखते हुए किसान लोग आलू की जगह पर दूसरे फसल लगा रहे हैं. महाराजगंज प्रखंड क्षेत्र में आलू की खेती दर्जनों गांव में बड़े पैमाने पर होती है. किसान लक्ष्मण सिंह ने बताया कि इस वर्ष वर्षा होने से समय पर खेत तैयार नहीं हो सका जिससे आलू की खेती प्रभावित हुई है. अब आलू के खेत में अगात प्याज की खेती करने का प्लान है. तो कुछ लोग गेहूं, राई आदि लगा रहे हैं. समय पर आलू की खेती होने पर काफी अधिक उपज होता है एक कट्ठा में तीन क्विंटल तक आलू हो जाता है. कृषक राघवेंद्र कुमार ने बताया कि आलू की फसल दो प्रकार की होती है. एक अगैती प्रभेद और दूसरी पीछैती. अगैती फसल की अक्टूबर महीने में बोआई कर दी जाती है. पिछैती आलू की बोआई नवंबर महीने में भी होती है. आमतौर पर बाजार में पिछैती बीज के अच्छी क्वालिटी उपलब्ध नहीं है. स्थानीय बाजार में अगैती किस्म के बीज मिलते हैं. पीछे बोआई करने वाले किसानों को काफी मेहनत करना पड़ता है. ठंड और पाला से बचाव के लिए बार-बार कीटनाशक और दवा का छिड़काव करना पड़ता है. आलू की खेती करने वाले किसानों को समय-समय पर सिंचाई के साथ मौसम का भी ध्यान रखना चाहिए. कुहासा और पाला की स्थिति में दवा का छिड़काव नियमित रूप से करना चाहिए, बाजार में कई तरह के दवा उपलब्ध है.

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By DEEPAK MISHRA

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