योगनिद्रा में गये भगवान विष्णु, 118 दिनों तक मांगलिक कार्यों पर लगा विराम

भगवान विष्णु के योग निद्रा में जाने के साथ ही चातुर्मास का आरंभ हो गया है, जिस कारण अगले 118 दिनों तक किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी. जानिए इस दौरान क्या करें और क्या न करें.

सृष्टि के प्रतिपालक भगवान विष्णु की आराधना का पर्व देवशयनी एकादशी शनिवार को श्रद्धा पूर्वक मनाई गई.इस के साथ चातुर्मास की भी शुरुआत हो गई. अगले 118 दिनों तक भगवान विष्णु योग निंद्रा में रहेंगे, जिससे सभी मांगलिक कार्य बंद रहेंगे. चार माह तक सृष्टि का भार शिव परिवार पर रहेगा.कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी से फिर से मांगलिक कार्यों की शुरूआत होगी.देवशयनी एकादशी पर श्रद्धालुओं ने सुबह ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने के बाद एकादशी व्रत का संकल्प लिया.इसके बाद सूर्य को अर्घ्य प्रदान कर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की. शाम को षोडशोपचार विधि पूजन के अनुसार धूप, दीप, पुष्प आदि से भगवान का पूजन, आरती कर प्रार्थना करेंगे. इसके बाद उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाकर श्वेत वर्ण की शैया पर शयन कराएंगे. चार महीने नहीं बजेगी शहनाई आचार्य पुरुषोत्तम तिवारी  ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार चातुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से शुरू होकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि तक रहता है. इस बार इसकी अवधि 118 दिन यानी 20 नवंबर तक रहेगी. 21 नवम्बर को दव देवउठनी एकादशी है.इस एकादशी के बाद से ही मांगलिक कार्य शुरू होंगे. देवउठनी एकादशी के बाद से शुरू होंगे मांगलिक कार्यक्रम शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए ग्रह-नक्षत्रों और सितारों की स्थितियों का अध्ययन किया जाता है. शुक्र और गुरु तारा की स्थिति को देखकर ही सभी विवाह मुहूर्त निश्चित किए जाते हैं.अगर शुक्र और गुरु दोनों ही तारे अस्त है,तो उस स्थिति में शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं निकलता है. दोनों के उदय होने पर ही विवाह और शुभ कार्य जैसे मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते है.नवम्बर माह में 21,24,25 और 26 नवम्बर को शादी का मुहूर्त है.वही दिसम्बर माह में 2,3,4,5,6,11 और 12 दिसम्बर को वैवाहिक कार्यक्रम के मुहूर्त है. चातुर्मास में नहीं करें ये काम चातुर्मास में विवाह व शुभ कार्यों पर रोक लगा दी जाती है.इस मास में  शिव परिवार के पूजा का विधान है. इन महीनों में यात्रा न करने की सलाह भी दी जाती है. इस दौरान घर से तभी निकलें जब जरूरी हो. क्योंकि इन चार महीनों में वर्षा ऋतु के कारण ऐसे जीव-जंतु सक्रिय हो जाते है. जो काफी नुकसान पहुंचा सकते है. चातुर्मास में श्रीहरि योग निद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते है. पाताल लोक में विश्राम करेंगे विष्णु-लक्ष्मी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी.दो पग में ही पूरे ब्रह्मांड को माप लिया था.तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे किया था.भगवान ने प्रसन्ना होकर वरदान दिया. राजा बलि ने भगवान को अपने साथ पाताल लोक में निवास करने का वरदान मांगा था. भगवान विष्णु के साथ उनकी पत्नी लक्ष्मी ने भी क्षीर सागर में निवास किया. इस काल को भगवान का विश्राम काल माना जाता है. चातुर्मास में भगवान की कथा सुनने, पूजा, पाठ, हवन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. चातुर्मास का है वैज्ञानिक महत्व  पंडित गोपाल तिवारी कहते है कि धार्मिक महत्व के साथ साथ चातुर्मास का वैज्ञानिक महत्व भी है.इस दृष्टिकोण से देखें तो इन दिनों बारिश होने से हवा में नमी बढ़ जाती है .इस दौरान  बैक्टीरिया और वायरस का प्रकोप होता है. इस कारण संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा अधिक रहता है. इससे बचने के लिए संतुलित खान-पान का सेवन करना चाहिए.साथ ही योग,तप व ध्यान करना चाहिए.चातुर्मास में आंतरिक व बाह्य शुद्धता पर ध्यान देनी चाहिए.


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By हिमांशु कुमार

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