Mauniya Baba Temple : बिहार के सीवान जिले के महाराजगंज अनुमंडल मुख्यालय में स्थित मौनिया बाबा मंदिर आस्था के साथ अपने अनोखे इतिहास के लिए भी जाना जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार नागा समाज के साधु मौनिया बाबा ने वर्ष 1923 में इसी स्थान पर जीवित समाधि ली थी. करीब एक सदी से अधिक समय से यहां पूजा-अर्चना और मेला आयोजित होता आ रहा है. अब यह आयोजन राजकीय मेले का रूप भी ले चुका है.
करीब 100 साल पुराना है मौनिया बाबा मंदिर
महाराजगंज में स्थित मौनिया बाबा मंदिर करीब 100 वर्ष पुराना बताया जाता है. स्थानीय लोग यहां हिंदू रीति-रिवाज और परंपरा के अनुसार वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना करते हैं. श्रद्धालु समाधि स्थल पर माथा टेककर आशीर्वाद लेते हैं.
सीवान से दूसरे राज्यों तक पहुंचते हैं श्रद्धालु
मौनिया बाबा की प्रसिद्धि केवल महाराजगंज तक सीमित नहीं है. सीवान, छपरा, गोपालगंज के अलावा झारखंड और पश्चिम बंगाल समेत अन्य जगहों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मेले के दौरान मंदिर और आसपास के इलाके में विशेष चहल-पहल रहती है.
कौन थे मौनिया बाबा
स्थानीय इतिहास और मान्यताओं के अनुसार मौनिया बाबा नागा समाज के साधु थे. बताया जाता है कि वह वर्ष 1911 में कांची कोटी पीठ से यहां पहुंचे थे. रमणीक स्थल पर आश्रम बनाकर उन्होंने अपना जीवन साधना और लोगों की सेवा में बिताया.
लोगों की परेशानियों में मदद करते थे बाबा
स्थानीय लोगों के अनुसार, इलाके में किसी व्यक्ति को बीमारी या अन्य परेशानी होने पर मौनिया बाबा उसकी मदद करते थे. उनकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ बड़ी संख्या में लोग उनके आश्रम पहुंचने लगे.
1923 में जीवित समाधि लेने की मान्यता
स्थानीय मान्यता है कि मौनिया बाबा ने वर्ष 1923 में इसी स्थान पर जीवित समाधि ली थी. इसके बाद उनके आश्रम के पास लगने वाला मेला समाधि स्थल के आसपास आयोजित होने लगा. तभी से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही है.
एक सदी से अधिक पुरानी है मेले की परंपरा
महाराजगंज में मौनिया बाबा का मेला करीब 100 वर्षों से अधिक समय से आयोजित होने की बात कही जाती है. पिछले वर्ष इस मेले को दो दिवसीय राजकीय मेले का दर्जा मिला. इसके साथ आयोजन को और व्यापक रूप मिला है.
आस्था के साथ लोक संस्कृति का संगम
मौनिया बाबा राजकीय मेले में धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति, अखाड़ों की परंपरा और शौर्य प्रदर्शन देखने को मिलता है. मेले में जिले के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं. जुलूस के दौरान पारंपरिक प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहती हैं.
समाधि स्थल की राख को लेकर भी मान्यता
मौनिया बाबा की समाधि के पास जलने वाली अखंड धूनी की राख को लेकर भी स्थानीय लोगों में एक मान्यता है. कहा जाता है कि चर्म रोग से परेशान व्यक्ति इस राख को शरीर पर लगाए तो उसे राहत मिल सकती है. हालांकि, यह धार्मिक और स्थानीय मान्यता है, इसका कोई चिकित्सकीय प्रमाण इस जानकारी में उपलब्ध नहीं है.
चमत्कार मानते हैं श्रद्धालु, अलग राय भी
कई श्रद्धालु धूनी की राख से जुड़ी मान्यता को बाबा का चमत्कार मानते हैं. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि राख में मौजूद कुछ तत्व इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. ऐसे दावों को वैज्ञानिक पुष्टि के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता.
मेले में 32 अखाड़ों का प्रदर्शन
मौनिया बाबा राजकीय मेले की सबसे खास परंपराओं में अखाड़ों का प्रदर्शन शामिल है. शहर और ग्रामीण क्षेत्रों से करीब 32 अखाड़े इसमें हिस्सा लेते हैं. इनमें नागाजी का मठ, प्रधान अखाड़ा, काजी बाजार और मोहन बाजार के अखाड़ों के साथ नवलपुर, पसनौली, रामापाली, अभुई, बेला गोविंदापुर, पकवलिया, सवान, इंदौली, रुकुंदीपुर, करसौत, बंगरा, तेवथा और झझंवा समेत कई गांवों के अखाड़े शामिल हैं.
10 और 11 सितंबर को प्रस्तावित है आयोजन
इस वर्ष अखाड़ों के प्रदर्शन के लिए 10 और 11 सितंबर 2026 की तिथि प्रस्तावित की गयी है. राजकीय मेले के दौरान कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाने की भी जानकारी दी गयी है.
एक महीने तक चलता है मेला
मौनिया बाबा स्थान पर लगने वाला मेला केवल दो दिनों तक सीमित नहीं रहता. स्थानीय जानकारी के अनुसार यहां करीब एक महीने तक मेला चलता है. मीना बाजार, झूले, मौत का कुआं और लकड़ी की दुकानों समेत कई आकर्षण मेले का हिस्सा होते हैं.
अखाड़ों में दिखता है शौर्य और अनुशासन
अखाड़ों के सदस्य जुलूस में शामिल होकर पारंपरिक प्रदर्शन करते हैं. इन प्रदर्शनों में शौर्य और कौशल की झलक देखने को मिलती है. जुलूस देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़क के किनारे जुटते हैं.
इस बार अनुशासन पर भी रहेगा जोर
प्रशासन ने इस बार अखाड़ों के प्रदर्शन के साथ अनुशासन को भी प्राथमिकता देने की बात कही है. अखाड़ाधारियों को निर्धारित नियमों के अनुसार जुलूस निकालना होगा. प्रदर्शन, नैतिक आचरण और अनुशासन के आधार पर अंक दिये जाएंगे. बेहतर प्रदर्शन करने वाले अखाड़ों को सम्मानित किया जाएगा, जबकि नियमों के उल्लंघन पर अंक काटे जाएंगे.
सौहार्द की परंपरा से जुड़ा है मेला
स्थानीय मान्यता के अनुसार, 1923 में बाबा की समाधि के बाद महाराजगंज और दारौंदा थाना क्षेत्र के करीब 32 गांवों के लोगों ने आपसी सौहार्द के साथ समाधि स्थल पर मेला आयोजित करने का निर्णय लिया था. समय के साथ यह आयोजन उत्तर बिहार के चर्चित मेलों में शामिल हो गया.
