संवाददाता, सीवान. आंदर नगर पंचायत में वाटर एटीएम लगाने की योजना को जिलाधिकारी विवेक रंजन मैत्रेय ने रद्द करने का निर्देश दिया है. साथ ही कार्यपालक पदाधिकारी को नये सिरे से योजना का कार्यान्वयन करने को कहा है. वहीं पूरे मामले में संबंधित एजेंसी के खिलाफ दीवानी एवं फौजदारी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश भी दिया गया है. बताते चलें कि प्रभात खबर ने 7 जनवरी को नपं आंदर में 1.90 करोड़ की योजना में अनियमितता की शिकायत और 13 जनवरी को वाटर एटीएम में गड़बड़ी में घिरी आंदर नगर पंचायत, डीएम ने बैठाई जांच, शीर्षक से खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया. इसके बाद डीएम ने त्वरित जांच पूरी कर आदेश जारी किया है. कार्यपालक पदाधिकारी को भेजे पत्र में कहा गया है कि आंदर नगर पंचायत में अधिष्ठापित किये गए वाटर एटीएम में करीब 95 लाख रुपये के अपव्यय और वित्तीय अनियमितता की शिकायत मिली थी. जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए है. डीएम ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि वाटर एटीएम के स्पेसिफिकेशन का निर्धारण सहायक अभियंता द्वारा किया गया. लेकिन लगभग एक करोड़ रुपये की इस योजना के लिए किसी भी स्तर पर तकनीकी अनुमोदन नहीं लिया गया. नियमों के अनुसार इतनी बड़ी योजना के लिए सक्षम प्राधिकार से तकनीकी स्वीकृति अनिवार्य होती है, लेकिन यहां इसे पूरी तरह नजर अंदाज कर दिया गया. वित्तीय कागजातों के अनुमोदन में जनप्रतिनिधियों को शामिल करना उचित नहीं- जांच में यह भी पाया गया कि टेंडर से जुड़े तकनीकी दस्तावेजों को सशक्त स्थायी समिति से अनुमोदित कराया गया, जबकि इस प्रकार के तकनीकी और वित्तीय कागजातों के अनुमोदन में जनप्रतिनिधियों को शामिल करना उचित नहीं है. डीएम ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि जनप्रतिनिधियों को बिहार वित्तीय नियमावली और राज्य सरकार के दिशा-निर्देशों का संपूर्ण प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, इसलिए ऐसे दस्तावेजों का अनुमोदन नगर पंचायत के मुख्यालय स्तर पर कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा किया जाना अपेक्षित था. तकनीकी और वित्तीय बिड से संबंधित कागजातों के अवलोकन के दौरान यह भी सामने आया कि जिस फर्म को कार्यादेश जारी किया गया, वह तकनीकी रूप से सक्षम नहीं थी. निविदा की शर्तों में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि एजेंसी को पिछले तीन वर्षों का टर्नओवर उपलब्ध कराना होगा और औसत टर्नओवर 40 लाख रुपये से अधिक होना चाहिए. इसके बावजूद चयनित एजेंसी ने मात्र एक वर्ष का टर्नओवर प्रमाणपत्र दिया, जिससे वह वित्तीय बिड में सफल नहीं हो सकती थी. इसके बाद भी अयोग्य एजेंसी को कार्यादेश जारी कर दिया गया.जो पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है. निविदा प्रक्रिया के दौरान आइएसओ प्रमाण पत्र को लेकर भी गड़बड़ी सामने आई है. बिड के तहत आइएसओ प्रमाण पत्र की मांग की गई थी.लेकिन इसके लिए कोई ठोस आधार या अभिलेख उपलब्ध नहीं पाया गया.चयनित एजेंसी द्वारा जो आइएसओ प्रमाण पत्र संलग्न किया गया. वह भी सक्षम प्राधिकार द्वारा निर्गत नहीं था. इसके बावजूद उसे मान्य कर लिया गया, डीएम ने यह भी कहा है कि वित्तीय बिड का निष्पादन नियमानुसार नहीं किया गया और खराब होने की स्थिति में एजेंसी पर किसी प्रकार का अर्थदंड लगाए जाने का भी कोई प्रावधान नहीं रखा गया. नगर पंचायत कार्यालय द्वारा निजी वेंडर से सामग्री प्राप्त की गयी- सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि वाटर एटीएम लगाने के कार्यादेश के बावजूद कई स्थानों पर वाटर एटीएम की जगह वाटर कूलर लगाए गए. बिना किसी जांच-पड़ताल के नगर पंचायत कार्यालय द्वारा निजी वेंडर से सामग्री प्राप्त कर ली गई. डीएम ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि निविदा प्रक्रिया दोषरहित थी, तब भी वाटर एटीएम के स्थान पर वाटर कूलर का अधिष्ठापन कराना सीधे तौर पर लोक धन के गबन के प्रयास की ओर संकेत करता है. कार्यादेश और बिड कागजातों में वाटर एटीएम के स्पेसिफिकेशन स्पष्ट रूप से दर्ज हैं. इसके बावजूद अधिकतम डेढ़ लाख रुपये बाजार मूल्य वाले वाटर कूलर का अधिष्ठापन कर दिया गया. इससे यह प्रतीत होता है कि प्रति वाटर एटीएम लगभग छह लाख रुपये के गबन की मंशा थी. इस तरह कुल मिलाकर करीब 72.45 लाख रुपये के गबन का प्रयास किए जाने की आशंका जताई गई है. डीएम की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि योजना के तहत किसी भी प्रकार की टेस्टिंग और कमिशनिंग की प्रक्रिया नियमानुसार नहीं की गई. इसी का परिणाम रहा कि कई स्थानों पर वाटर एटीएम के नाम पर वाटर कूलर लगा दिए गए. कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा डीएम के संज्ञान में मामला आने के बाद वेंडर को वाटर कूलर की जगह वास्तविक वाटर एटीएम लगाने के लिए पत्र भेजना केवल खानापूर्ति बताया गया है.जिसे डीएम ने सर्वथा अनुचित करार दिया है. योजना के तहत अब तक किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया गया है- डीएम ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि नगर पंचायत आंदर के कार्यपालक पदाधिकारी तत्काल कार्यादेश को रद्द करें और निम्नस्तरीय सामग्री की आपूर्ति करने वाली एजेंसी के खिलाफ दीवानी एवं फौजदारी कार्रवाई शुरू करें. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि प्रक्रिया को रद्द नहीं किया गया तो सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों के खिलाफ बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा-18(2) के तहत राज्य निर्वाचन आयोग को सूचित किया जा सकता है.साथ ही कार्यपालक पदाधिकारी के खिलाफ धारा-67 के तहत विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई की संस्तुति भी की जा सकती है.
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