सीवान : प्रेम व भाईचारा के पर्व होली के लिए जगह-जगह होलिका स्थापित कर दी गयी है. होलिका में जाने-अनजाने में लोग हरे पेड़-पौधों को होलिका का हिस्सा बना देते है. पेड़ों को काट देते है, लेकिन ऐसा करने वालों को समझाना चाहिए कि वे पर्यावरण को कितनी क्षति पहुंचा रहे हैं.
होली मनाएं और होलिका जलाएं, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं. एक पहल करे इस होलिका में न तो हरियाली जलाएं और न ही उसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कोई अन्य तत्व डालें.
हम अपनी जिम्मेदारी समझे कि वातावरण को शुद्ध रखेंगे. पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ पंकज कुमार बताते है कि विदेशों की तरह उत्सव मनाने के लिए कुछ सामूहिक रूप से स्थान निर्धारित कर दिये जाने चाहिए. ऐसा करने से निश्चित रूप से जितनी चीजें जलायी जाती हैं, उनके एक चौथाई में ही काम चल जायेगा.
हरे पेड़-पौधों को काटकर जलाना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना है. टायर, प्लास्टिक जलाना तो और खतरनाक है, इससे कार्बन डाइअक्साइड, कार्बन मोनोअक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड और सबसे ज्यादा कार्बन के कण निकलते हैं और पार्टिकल मैटर वातावरण में बढ़ जाते है. इससे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. इन गैसों से वातावरण का तापमान बढ़ रहा है.
