Hindi culture: आज की पीढ़ी वन, टू, थ्री के फेर में अपनी मूल पहचान एक, दो, तीन को भूलती जा रही है. कुछ ऐसा ही हाल हमारी संस्कृति और हिंदी पंचांग का भी है, जहां बच्चों को जनवरी-फरवरी तो याद हैं, लेकिन चैत्र-वैशाख और ज्येष्ठ-आषाढ़ जैसे हिंदी महीनों के नाम उनके दिमाग से ओझल हो चुके हैं. नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़े रखने के उद्देश्य से माधोपुर रौशन (भीसा) में एक विशेष साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया.
यह कार्यक्रम 'कला-संगम' और 'पं चंद्रशेखर धर शुक्ल साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थान' के संयुक्त तत्वावधान में 'मत भूलें अपनी माटी को' अभियान के तहत आयोजित किया गया था. कार्यक्रम की अध्यक्षता कला-संगम के अध्यक्ष व प्रख्यात गीतकार गीतेश ने की, जबकि मंच संचालन जाने-माने शिक्षाविद् राजू कुमार ने किया.
बच्चों को भेंट की गई हिंदी महीनों और गिनती की हस्तलिखित प्रति
परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव में बच्चे अपनी मातृभाषा और स्थानीय संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि अपनी विरासत को बचाना है, तो बच्चों के बीच जाकर सीधे संवाद स्थापित करना बेहद जरूरी है.
इस अनूठी पहल के तहत साहित्यानुरागी अधिवक्ता पंकज कुमार ने इंग्लिश मीडियम स्कूल के छात्र-छात्राओं—दिव्यांश राज, मयंक कुमार, तृषा कुमारी और रिद्धि कुमारी समेत कई बच्चों को हिंदी गिनती और हिंदी महीनों के नामों की हस्तलिखित प्रति (हैंड रिटेन कॉपी) उपहार स्वरूप भेंट की. इस पहल का उद्देश्य बच्चों में अपनी भाषा के प्रति रुचि जगाना है.
कवि गोष्ठी में गूंजीं संस्कृति और माटी की रचनाएं
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में एक शानदार कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें कवियों ने अपनी रचनाओं के जरिए वर्तमान सामाजिक परिवेश पर तीखा कटाक्ष किया और संस्कृति संरक्षण का संदेश दिया.
गीतकार गीतेश ने अपनी पंक्तियों से वर्तमान समय की कड़वी सच्चाई को उजागर करते हुए पढ़ा: "आप वाकिफ हो रहे हैं आसमां की उड़ान से, लेकिन कटते जा रहे हैं अपने खेत और खलिहान से."
- कृष्णनंदन लक्ष्य ने हिंदी की मिठास को बयां करते हुए अपनी कविता प्रस्तुत की:
"हिंदी हमारे पास है, इसमें गजब की खुशबू और मिठास है."
- सुकेश सत्यांश ने युवा पीढ़ी को सचेत करते हुए अपनी पंक्तियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया:
"बातें समझनी होगी युवा पीढ़ी को, हमें महफूज रखनी है अपनी संस्कृति की सीढ़ी को."
इस बौद्धिक और सांस्कृतिक आयोजन में बड़ी संख्या में स्थानीय प्रबुद्ध लोग, साहित्यकार और बच्चे मौजूद रहे, जिन्होंने इस मुहिम की सराहना की.
