सीतामढ़ी: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किसानों को मिली ट्रेनिंग, बदलेगा खेती का अंदाज

Sitamarhi News: सीतामढ़ी के पुपरी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र बलहा-मकसूदन में निकरा परियोजना के तहत ट्रेनिंग और धान बीज का वितरण. डॉ. रामेश्वर प्रसाद और वैज्ञानिकों ने दिए जीरो टिलेज खेती के टिप्स. जानिए खबर विस्तार से…

Sitamarhi News: तेजी से बदलते मौसम चक्र और कृषि संकट के दौर में अन्नदाताओं को संबल प्रदान करने के लिए एक बड़ी पहल की गई है. कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), बलहा-मकसूदन, सीतामढ़ी के भव्य प्रशिक्षण सभागार में टीडीसी-निकरा (TDC-NICRA) परियोजना के अंतर्गत ‘जलवायु अनुकूल तकनीक आधारित प्रशिक्षण सह उपादान वितरण’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस विशेष जिला स्तरीय कार्यक्रम का विधिवत शंखनाद केंद्र के वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ. रामेश्वर प्रसाद और अन्य विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया. इस प्रशिक्षण चौपाल में चंपारण-मिथिलांचल क्षेत्र के दर्जनों प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर आधुनिक खेती के गुर सीखे.

खेती की तकनीक और परंपरागत सोच में बदलाव जरूरी

समारोह को मुख्य रूप से संबोधित करते हुए केवीके के प्रधान डॉ. रामेश्वर प्रसाद ने कहा कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Global Climate Change) के कारण आज खेती-किसानी के सामने सूखे और बेमौसम बारिश जैसी कई नई और कड़क चुनौतियां आ रही हैं. इन संकटों से निपटने के लिए अब भूमि संरक्षण, खेती की वैज्ञानिक तकनीकों में बदलाव और किसानों को अपनी परंपरागत सोच में परिवर्तन लाना नितांत आवश्यक हो गया है, ताकि बदले हुए मौसम में भी फसलों का बंपर और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके.

रासायनिक खादों से मिट्टी में घटा ऑर्गेनिक कार्बन

तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए उद्यान वैज्ञानिक मनोहर पंजीकार, सस्य वैज्ञानिक सच्चिदानंद प्रसाद, कृषि प्रसार वैज्ञानिक डॉ. पिनाकी रॉय और पादप रक्षा वैज्ञानिक डॉ. श्रीति मोसेस ने मिट्टी की बिगड़ती सेहत पर गंभीर चिंता व्यक्त की. वैज्ञानिकों ने दो टूक शब्दों में बताया कि खेतों में लगातार अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों, जहरीले कीटनाशकों और फफूंदनाशकों के प्रयोग से मिट्टी के मित्र सूक्ष्म जीवों की संख्या और ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा खतरनाक स्तर तक घट गई है. इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि रासायनिक खाद पौधों को ठीक से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं और किसान पैदावार के चक्कर में हर साल उर्वरक की मात्रा बढ़ाते जा रहे हैं, जिससे लागत बढ़ रही है और जमीन बंजर हो रही है.

वैज्ञानिकों ने किसानों को कई कड़े और व्यावहारिक सुझाव दिए

  • दलहनी फसलें व वर्मीकम्पोस्ट: मिट्टी की खोई हुई उर्वरा शक्ति को प्राकृतिक रूप से वापस लाने के लिए साल में कम से कम एक बार खेत में दलहनी फसलों की बुवाई, केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) का प्रयोग और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाना अनिवार्य है.
  • जीरो टिलेज पद्धति: वैज्ञानिकों ने धान की पारंपरिक रोपाई के बजाय धान की सीधी बुवाई (DSR) या जीरो टिलेज (बिना जुताई) पद्धति अपनाने की पुरजोर सलाह दी. इस आधुनिक तकनीक से जुताई का खर्च, सिंचाई का पानी और खाद तीनों की भारी बचत होती है.
  • कम अवधि वाले प्रभेद: पानी की बढ़ती किल्लत को देखते हुए खरीफ सीजन में 125 से 150 दिनों में तैयार होने वाली सामान्य किस्मों की जगह महज 90 से 100 दिनों में पककर तैयार होने वाली धान की विशेष प्रभेदों, जैसे ‘तुरंता’ और ‘प्रभात’ की खेती करने का निर्देश दिया गया.

किसानों के बीच हुआ उन्नत धान के बीजों का मुफ्त वितरण

प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतिम चरण में धरातल पर तकनीक को उतारने और जलवायु अनुकूल धान प्रभेदों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उपस्थित किसानों के बीच धान के उन्नत एवं प्रमाणित बीजों का मुफ्त वितरण किया गया. इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण सह उपादान वितरण कार्यक्रम के मुख्य मौके पर श्याम बिहारी राय, नवल किशोर महतो, अजय कुमार, जुमायदा खातून और प्रियंका कुमारी समेत भारी संख्या में स्थानीय महिला व पुरुष किसान मौजूद रहे, जिन्होंने वैज्ञानिक खेती अपनाने का संकल्प लिया.

सीतामढ़ी के पुपरी से बैधनाथ ठाकुर का रिपोर्ट

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Published by: Purushottam Kumar

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