Water crisis and agricultural: नेपाल से निकलकर सीतामढ़ी जिले से गुजरने वाली कई नदियां अपने आंचल में गहरा धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व समेटे हुए हैं. हिंदू सनातन धर्म में युग-युगांतर से इन नदियों को देवी के रूप में पूजा जाता रहा है, जो इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के जीवन की रक्षक रही हैं. लेकिन आज सदियों से किसानों को खुशहाली का वरदान बांटने वाली इन नदियों का अस्तित्व खतरे में है. अधवारा समूह की इन नदियों की सूरत इस कदर बदरंग हो चुकी है कि इनका पानी अब न तो जीव-जंतुओं की प्यास बुझाने के लायक बचा है और न ही खेतों की सिंचाई के काबिल.
वर्षों से मृतप्राय पड़ी हैं परिहार की हरदी और मरहा नदी
परिहार प्रखंड से दो मुख्य नदियां—हरदी और मरहा बहती हैं. मरहा नदी पिछले कई वर्षों से पूरी तरह मृतप्राय अवस्था में है. वहीं, हरदी नदी का हाल भी ऐसा ही है, जहां अब केवल मानसून के समय ही थोड़ा-बहुत पानी का प्रवाह देखने को मिलता है. अतीत में यह नदी हजारों किसानों के लिए सिंचाई का मुख्य सहारा हुआ करती थी. इसके जल में इतनी उर्वरा शक्ति थी कि इसके पानी से खेत की फसलें लहलहा उठती थीं. लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है.
सूखे नहर में तब्दील हुई नदियां, धड़ल्ले से हो रहा अवैध खनन
नदियां आज इस कदर लाचार हैं कि वे अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर पा रही हैं. पानी सूखने के कारण इन नदियों के सीने को चीरकर धड़ल्ले से मिट्टी और बालू का अवैध खनन किया जा रहा है. बदहाली का आलम यह है कि ये नदियां अब महज एक सूखे नहर के रूप में तब्दील हो चुकी हैं. नेपाल से निकलने वाली इन नदियों में अब केवल बरसात के चंद महीनों में ही पानी देखने को मिलता है. अगर समय रहते इन मृतप्राय होती नदियों को नहीं बचाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब ये सिर्फ किताबों और कहानियों का हिस्सा बनकर रह जाएंगी.
गर्मी में सूखा और बरसात में बाढ़ का अभिशाप
यह विडंबना ही है कि जो नदियां कभी जीवनदायिनी थीं, वे आज क्षेत्रवासियों के लिए एक अभिशाप बन चुकी हैं. हर वर्ष मानसून की दस्तक के साथ ही परिहार प्रखंड के दर्जनों गांवों पर बाढ़ का भीषण खतरा मंडराने लगता है. प्रखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि नेपाल के तराई क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश का सीधा और त्वरित असर यहां की नदियों पर पड़ता है.जैसे ही मरहा और हरदी नदियां उफान पर आती हैं, आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं. देखते ही देखते मुख्य सड़कें टूट जाती हैं, संपर्क मार्ग पूरी तरह कट जाते हैं और कई गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं. जलस्तर बढ़ते ही लोगों के घरों, खेतों और सुनहरे सपनों पर पानी फिर जाता है, और वर्षों से चली आ रही यह त्रासदी आज भी जस की तस बनी हुई है.
