अपने को कुर्बान कर दूसरों को उज्ज्वल करे, वही साधु : मोरारी बापू

सीतामढ़ी : शास्त्रों में भगवान शंकर को परम वैष्णव कहा गया है. वैष्णव को संकीर्णता की नजर से न देखें. परंपरा जड़ नहीं होना चाहिए. गंगा की तरह कल-कल परंपराएं होनी चाहिए. परंपरा जड़ हो जाती है, तो समाज में विकृति आती है. हमारे जन्म का कारण माता-पिता होते हैं. शुभ-अशुभ कर्म का फल परमात्मा […]

सीतामढ़ी : शास्त्रों में भगवान शंकर को परम वैष्णव कहा गया है. वैष्णव को संकीर्णता की नजर से न देखें. परंपरा जड़ नहीं होना चाहिए. गंगा की तरह कल-कल परंपराएं होनी चाहिए. परंपरा जड़ हो जाती है, तो समाज में विकृति आती है. हमारे जन्म का कारण माता-पिता होते हैं. शुभ-अशुभ कर्म का फल परमात्मा देते हैं. ‘मिथिला धाम’ में आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के आठवें दिन की कथा के दौरान मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू एक श्रोता के सवाल का जवाब दे रहे थे.

एक अन्य श्रोता के माला से संबंधित पूछे गये सवाल पर बापू ने कहा कि लड़ो मत. माला के लिए समन्वय करो. प्रतिभा रखो, लेकिन सबको मिलाना सीखो. सभी शास्त्रों को खिचड़ी बना कर खा लो. पच जाएगा. बापू ने एक अन्य
अपने को कुर्बान
श्रोता के सवाल ‘साधु एवं संत में क्या अंतर है’ का जवाब देते हुए कहा कि जो जीवन में किसी से तंत (विवाद) न करे, वही संत है. जिसका कभी अंत नहीं होता, वही संत है. किसी से संघर्ष न करे, वही संत है. जिसमें कभी महंत बनने की इच्छा न हो, वही संत है. जो अनंत है, वही संत है. जिसका जीवन सादा है, वही साधु है. जिसका आहार, वाणी, बर्तन व व्यवहार साधु जैसा है, वही साधु है. अपने को कुर्बान कर दूसरे को उज्ज्वल करे, जो सच्चा जीवन जीये, वह साधु है. बापू ने कहा कि साधु का कोई यूनिफॉर्म नहीं होता है. साधु तो यूनिवर्सल होता है. बापू ने कहा कि प्रकृति और पुरुष दोनों माता-पिता हैं. सीता प्रकृति, तो राम पुरुष हैं. सीता शक्ति हैं, तो राम शक्तिमान हैं. प्रकृति सदैव जड़ मानी गई है. प्रकृति के पांच अंगों में एक पृथ्वी है. शक्ति मिथिला में प्रकट होती है और शक्तिमान अयोध्या में.
भाइयों में जंग हो, तो हार जाना चाहिए
बापू ने एक अन्य श्रोता के सवाल ‘गुरु और सदगुरु में क्या अंतर है’ का जवाब देते हुए कहा कि मां संतान को गर्भ में धारण करती है. बच्चे 6-7 साल के होते हैं, तो माता संतान को गुरु के पास ले जाती है. प्रार्थना करती है कि अब इसे आप अपने गर्भ में धारण कर लो. बापू ने कहा कि नूतन जन्म गुरु के पास होता है. सदगुरु दूसरा जन्म देता है. माता-पिता शरीर, धर्म एवं अर्थ देते हैं. गुरु हमारी चेतना को विकसित कर देता है. गुरु तन-मन की अस्वच्छता को निर्गुण कर देता है. सदगुरु का साथ मिल जाता है, तो हमारे में सहन और धैर्य की शक्ति बढ़ जाती है. गुरु जल तत्व देता है. गुरु संवेदना है. गुरु को कभी गंवाना मत. मैं कैसे खुद को धूप से हटा लूं. मेरी छाया में कोई सो रहा है. ये संवेदना है. गुरु ये देता है. बापू ने दुनियां को संदेश देते हुए कहा कि अगर भाइयों में जंग हो, तो हार जाना चाहिए. माता-पिता दु:खी हों, ऐसा काम कभी भी नहीं होना चाहिए.

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