आशा कार्यकर्ताओं की पहल से बदली सोच, घर के बजाय अस्पतालों में गूंज रही

पहले हम सोचते थे कि घर में ही प्रसव हो जाये तो ठीक है. अस्पताल जाने से डर लगता था, लेकिन आशा दीदी ने बार-बार समझाया कि अस्पताल में मां और बच्चे दोनों सुरक्षित रहते हैं.

छपरा. पहले हम सोचते थे कि घर में ही प्रसव हो जाये तो ठीक है. अस्पताल जाने से डर लगता था, लेकिन आशा दीदी ने बार-बार समझाया कि अस्पताल में मां और बच्चे दोनों सुरक्षित रहते हैं. प्रशिक्षण के बाद आशा कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर अपनी भूमिका और मजबूत की. उन्होंने नियमित घर-घर विजिट की, महिलाओं और उनके परिजनों से बैठकर बात की और सुरक्षित प्रसव के महत्व को सरल भाषा में समझाया. परिणामस्वरूप समुदाय का भरोसा सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों पर बढ़ता चला गया. अब दोनों पंचायतों में हर महीने औसतन 20 से 25 संस्थागत प्रसव हो रहे हैं.कोंध पंचायत में जनवरी 2025 से अगस्त तक 92 संस्थागत प्रसव दर्ज किये गये. जबकि केवल एक गृह प्रसव हुआ.बसहियां पंचायत में इसी अवधि के दौरान 86 महिलाओं का प्रसव सरकारी अस्पताल में हुआ और मात्र दो गृह प्रसव सामने आये. गृह प्रसव की एक बड़ी वजह समय पर एंबुलेंस सेवा न मिलना भी था.इस समस्या को गंभीरता से लेते हुये कोंध और बसहियां पंचायतों को प्राथमिकता सूची में शामिल किया गया. एंबुलेंस सेवा की मॉनिटरिंग मजबूत की गयी.और इन क्षेत्रों से आने वाले कॉल को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी.

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Published by: Alok kumar

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