Shailesh Kumar Badwater 135 : सारण के एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय नौसेना में देश सेवा कर रहे शैलेश कुमार ने दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण अल्ट्रा मैराथन में भारत का नाम रोशन किया है. 35 वर्षीय शैलेश ने जुलाई 2026 में अमेरिका की डेथ वैली में आयोजित 135 मील यानी करीब 217 किलोमीटर लंबी बैडवाटर-135 रेस को 29 घंटे 28 मिनट 37 सेकंड में पूरा किया. इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने नया कोर्स रिकॉर्ड बनाया और इस स्पर्धा को सबसे तेज समय में पूरा करने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव हासिल किया.
डेथ वैली की भीषण गर्मी में 217 किमी की दौड़
अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित डेथ वैली में आयोजित बैडवाटर-135 दुनिया की बेहद कठिन अल्ट्रा मैराथन स्पर्धाओं में शामिल है. करीब 217 किलोमीटर की इस दौड़ में प्रतिभागियों को लंबी दूरी के साथ बेहद गर्म मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. शैलेश ने इन चुनौतियों के बीच पूरी दूरी तय कर अपनी असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया.
29 घंटे 28 मिनट में फिनिश लाइन पार
बैडवाटर-135 में शैलेश कुमार ने 29 घंटे 28 मिनट 37 सेकंड का समय दर्ज किया. इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने नया कोर्स रिकॉर्ड बनाया. उनकी उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इस कठिन अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए इसे सबसे तेज समय में पूरा करने वाले पहले भारतीय का रिकॉर्ड अपने नाम किया.
छह महीने की तैयारी, 3000 किमी से ज्यादा ट्रेनिंग
बैडवाटर-135 में उतरने के लिए शैलेश ने करीब छह महीने तक कड़ा प्रशिक्षण लिया. इस दौरान उन्होंने 3000 किलोमीटर से अधिक की ट्रेनिंग दूरी तय की. लंबे समय तक दौड़ने के अभ्यास के साथ उन्होंने कम नींद, तेज धूप और लगातार शारीरिक-मानसिक दबाव में खुद को तैयार किया.
देश का प्रतिनिधित्व करना था कई साल पुराना सपना
अमेरिका की इस प्रतिष्ठित अल्ट्रा मैराथन में भारत का प्रतिनिधित्व करना शैलेश का कई वर्षों से सपना था. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने अपनी दिनचर्या को पूरी तरह प्रशिक्षण के अनुरूप ढाला. लगातार अभ्यास, अनुशासन और मानसिक मजबूती उनकी तैयारी का अहम हिस्सा रहे.
सारण के किसान परिवार में बीता बचपन
शैलेश कुमार का जन्म सारण जिला मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर गड़खा प्रखंड के कमालपुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ. उनके पिता बिंदेश्वरी प्रसाद किसान हैं. चार भाइयों में सबसे छोटे शैलेश का बचपन गांव के सामान्य ग्रामीण माहौल में बीता. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की.
2013 में नौसेना से जुड़ने के बाद बदली जिंदगी
बेहतर भविष्य की तलाश और परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के बीच शैलेश वर्ष 2013 में भारतीय नौसेना से जुड़े. देश सेवा का यह सफर उनके जीवन में अहम मोड़ साबित हुआ. वर्तमान में वह केरल के कोच्चि स्थित नेवल एयरक्राफ्ट यार्ड में सेवाएं दे रहे हैं.
नौसेना के अनुशासन ने बनाया मजबूत एथलीट
नौसेना की अनुशासित जीवनशैली ने शैलेश की फिटनेस और मानसिक मजबूती को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभायी. विभागीय अधिकारियों के प्रोत्साहन और सहयोग से उन्हें खेल और एडवेंचर गतिविधियों में आगे बढ़ने का अवसर मिला. इसी माहौल ने उनके भीतर छिपे लंबी दूरी के धावक को नई पहचान दी.
2014 में फिटनेस के लिए शुरू की थी दौड़
शैलेश ने वर्ष 2014 में सामान्य फिटनेस के लिए दौड़ना शुरू किया था. शुरुआत में दौड़ उनके लिए व्यायाम का हिस्सा थी, लेकिन धीरे-धीरे यही गतिविधि उनका जुनून बन गयी. दो हाफ मैराथन और एक फुल मैराथन पूरी करने के बाद उन्होंने लंबी दूरी की दौड़ में आगे बढ़ने का फैसला किया.
2018 में 101 किमी की दौड़ ने बदल दिया करियर
वर्ष 2018 में गुजरात के धोलावीरा में आयोजित 'रन द रण 101 किमी' अल्ट्रा मैराथन में उन्होंने हिस्सा लिया. यह उनका पहला बड़ा अल्ट्रा रनिंग इवेंट था. शैलेश ने अपने पहले ही अल्ट्रा इवेंट में ओवरऑल तीसरा स्थान हासिल किया. इस सफलता ने उन्हें लंबी दूरी की दौड़ में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया.
स्पार्टाथलॉन में 246 किमी की चुनौती पूरी की
शैलेश ने ग्रीस की प्रसिद्ध 246 किलोमीटर लंबी स्पार्टाथलॉन अल्ट्रा मैराथन में भी हिस्सा लिया. उन्होंने इस कठिन प्रतियोगिता को 33 घंटे 56 मिनट 22 सेकंड में पूरा किया. यह उपलब्धि उनके अंतरराष्ट्रीय अल्ट्रा रनिंग करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है.
कई प्रतिष्ठित अल्ट्रा रेस में दिखाया दम
बैडवाटर-135 से पहले भी शैलेश ने देश और विदेश की कई कठिन अल्ट्रा मैराथन में अपनी क्षमता साबित की. उन्होंने 'फोर्ट अल्ट्रा 100 माइल्स', 'व्हाइट सैंड अल्ट्रा' और 'हेनर बंबू अल्ट्रा' जैसी प्रतियोगिताओं में जीत हासिल करने के साथ कोर्स रिकॉर्ड भी बनाए.
पहाड़ से रेगिस्तान तक कठिन ट्रैक पर दौड़े
शैलेश ने सोलंग स्काई अल्ट्रा, मलनाड अल्ट्रा, डेक्कन अल्ट्रा और ला अल्ट्रा 111 किमी जैसी कठिन प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया. अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों वाले ट्रैक पर लगातार प्रदर्शन ने उन्हें एक मजबूत अल्ट्रा रनर के रूप में स्थापित किया.
गांव से निकला युवा बना देश की पहचान
शैलेश की कहानी केवल एक खेल उपलब्धि तक सीमित नहीं है. किसान परिवार से निकलकर भारतीय नौसेना में सेवा देने और फिर दुनिया की कठिनतम अल्ट्रा मैराथन में रिकॉर्ड बनाने तक का उनका सफर मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता की मिसाल है. उनकी उपलब्धि सारण के साथ-साथ बिहार के उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं.
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