सारण से मार्मिक तस्वीर: पेट की आग ने हराई बारिश, सवारी के इंतजार में भीगता रहा रिक्शा चालक महेंद्र सिंह

गर्मी, सर्दी या बारिश, हर मौसम में पेट पालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. सारण से आई यह तस्वीर दिहाड़ी मजदूरों और रिक्शा चालकों के संघर्ष को दर्शाती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी रोजी-रोटी की तलाश में सड़कों पर डटे रहते हैं.

सारण के परसा से मोहम्मद यूसुफ की रिपोर्ट Saran News : बारिश का मौसम जहां लोगों को गर्मी से राहत देता है, वहीं दिहाड़ी मजदूरों, रिक्शा चालकों और ठेला चालकों के लिए यह रोज़ी-रोटी की बड़ी चुनौती बन जाता है. गुरुवार को परसा में हुई तेज बारिश के बीच भी कई मेहनतकश लोग काम की तलाश में सड़कों पर डटे रहे. दरोगा राय चौक पर रिक्शे पर बैठा सवारी का इंतजार करता एक चालक इस संघर्ष की मार्मिक तस्वीर बन गया.

बारिश में भी सवारी की आस लगाए बैठा रहा महेंद्र सिंह

परसा थाना क्षेत्र के शंकरडीह निवासी रिक्शा चालक महेंद्र सिंह रोज की तरह सुबह घर से निकले थे. लेकिन पूरे दिन रुक-रुक कर हुई बारिश के कारण सड़कें सूनी रहीं और यात्रियों की संख्या काफी कम हो गई. इसके बावजूद वह दरोगा राय चौक पर अपने रिक्शे पर बैठे सवारी का इंतजार करते रहे, ताकि कुछ कमाई हो सके और घर का खर्च चल सके.

'एक दिन काम नहीं करें तो चूल्हा जलाना मुश्किल'

महेंद्र सिंह ने बताया कि परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हर दिन काम करना उनकी मजबूरी है. उन्होंने कहा, "तपती गर्मी हो, कड़ाके की ठंड हो या तेज बारिश, हमें हर मौसम में घर से निकलना पड़ता है. अगर एक दिन भी काम नहीं करें तो परिवार का चूल्हा जलाना मुश्किल हो जाता है." उन्होंने बताया कि बारिश के दिनों में सवारी कम मिलने से आमदनी पर सीधा असर पड़ता है, जबकि परिवार की जरूरतें लगातार बनी रहती हैं.

दिहाड़ी मजदूरों के सामने गहराया आर्थिक संकट

स्थानीय लोगों का कहना है कि रिक्शा चालक, ठेला चालक और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह रोज की कमाई पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में बारिश या अन्य प्रतिकूल मौसम के दौरान काम ठप होने से उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है. कई परिवारों के लिए एक दिन की कमाई रुकना भी बड़ी परेशानी बन जाता है.

मेहनतकश वर्ग के संघर्ष की बनी मार्मिक तस्वीर

दरोगा राय चौक पर बारिश के बीच रिक्शे पर बैठे महेंद्र सिंह का दृश्य मेहनतकश वर्ग की मजबूरी और संघर्ष की कहानी बयां करता है. यह तस्वीर बताती है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गरीब मजदूर अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए हर दिन उम्मीद के सहारे सड़कों पर निकलने को मजबूर हैं.


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By विवेक सिंह

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