छपरा का ऐतिहासिक घंटाघर: कभी चलता था लंदन की घड़ियों से, अब 65 साल से ठप

Saran News : छपरा का ऐतिहासिक घंटाघर युवाओं को कर रहा आकर्षित, रिसर्च और संरक्षण की बढ़ी मांग

Saran News (प्रभात किरण हिमांशु) : शहर के राजेंद्र कॉलेज में मौजूद घंटाघर की घड़ी ने वर्ष 1961-62 के बीच अंतिम बार समय बताया था. विगत 65 सालों से घंटाघर की घड़ी खराब है. कॉलेज से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 1885 में कॉलेज के इस भवन में घंटा घर बनवाया गया था. उस समय इस भवन में कॉलेज का संचालन नहीं होता था. समाजसेवी साह बनवारी लाल ने यहां एक भवन बनाकर कर उसमें घंटाघर बनवाया, जहां लंदन से चार बड़े घंटे व चार घड़ियां मंगवायी गयी थी, जिन्हें दीवार पर लगाया गया.

कभी इसकी आवाज से जागता था छपरा

इस घंटे की आवाज से ही पूरा शहर उठता था और अपनी दैनिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए भी लोग इस घंटे की आवाज का ही सहारा लिया करते थे. दुकान खोलनी हो या लोगों को ऑफिस जाना हो लोग इस घंटे की आवाज सुनकर ही समय का अंदाज लगाते थे और अपने गंतव्य की ओर निकल पड़ते थे. कई पुराने लोग बताते हैं कि घंटे की आवाज 15 से 20 किलोमीटर दूर सुदूर ग्रामीण इलाकों को तक सुनाई देती थी.

फिर भी चालू नहीं हो सका घंटाघर

कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो सुशील कुमार सिन्हा बताते हैं कि वर्ष 1938 में राजेंद्र कॉलेज की स्थापना इसी भवन में की गयी थी. उस समय यह घंटाघर चल रहा था. बाद में कुछ तकनीकी खराबी आ जाने से यह बंद हो गया. इसके बाद वर्ष 1960-61 में तत्कालीन प्राचार्य भोला प्रसाद ने देश के कुछ बड़े इंजीनियर को बुलाकर इसे चालू कराने का प्रयास किया था. कुछ दिन के लिए यह ठीक भी हो गया था. बाद में फिर इसमें गड़बड़ी आ गयी. उसके बाद से यह बंद पड़ा है. डेढ़ दशक पहले तत्कालीन प्राचार्य डॉ एसके शरण ने इसके मेंटेनेंस का प्रयास शुरू किया था, लेकिन यह प्रयास अधूरा ही रह गया.

20 किमी दूर तक सुनाई देती थी गूंज

राजेंद्र कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के सेवानिवृत प्राध्यापक प्रो कुमार वीरेश्वर सिन्हा बताते हैं कि वह इस कॉलेज के विद्यार्थी भी रहे हैं, जब उन्होंने वर्ष 1960 में कॉलेज में दाखिला लिया, उस समय यह घड़ी चलती थी. इसका घंटा आवाज भी करता था. कुछ दिन बाद यह फिर से खराब हो गया. उन्होंने बताया कि जब घड़ी का घंटा बजता था तब इसकी आवाज 20 किलोमीटर दूर मांझी तक सुनायी देती थी. शहर के लोग घड़ी के घंटे की आवाज से ही अपनी दिनचर्या पूरी करते थे. घंटे की आवाज सुन व्यवसायी घर से दुकान खोलने के निकलते थे.

ऐतिहासिक घंटाघर के रखरखाव पर बनेगी योजना

जिले के कई शिक्षाविद तथा छात्र संगठनों द्वारा भी इस ऐतिहासिक घड़ी के मेंटेनेंस की मांग लगातार की जाती रही है. कई बार प्रमुख छात्र संगठनों ने लिखित आवेदन देकर कॉलेज प्रशासन से इसके मेंटेनेंस की मांग की है. जयप्रकाश विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी राजेश पांडेय का कहना है कि इस समय राजेंद्र कॉलेज में विकास की कई योजनाओं पर काम चल रहा है. कई नये भवन बने हैं. आने वाले समय में इस घड़ी के मेंटेनेंस को लेकर भी एक रूपरेखा तय की जायेगी.

इतिहास को संजोने की मांग तेज

राजेंद्र कॉलेज में अध्यनरत रचना कुमारी, मयंक गुप्ता, सुहानी, विशाल कुमार गुप्ता, रजत कुमार, विनीत सिंह आदि छात्र-छात्राओं की भी इस घंटा घर पर रिसर्च करने की रुचि है. कई छात्र घंटाघर के ऊपरी तल पर जाकर वहां रखें भारी भरकम घंटा के पुराने मॉडल की तस्वीर खींचते हैं. कई छात्रों ने बताया कि इस घंटा पर मेड इन लंदन लिखा हुआ है. इसका वजन काफी अधिक है. तीन चार प्रकार के अलग-अलग घंटा लगाये हुए हैं. इसके मेंटेनेंस के लिए एक अलग से केबिन भी बना हुआ है. यदि कुशल इंजीनियरों को बुलाया जाये तो निश्चित तौर पर यह घंटाघर फिर से शुरू हो सकेगा. छात्रों का कहना यह हमारे जिले के समृद्ध इतिहास का प्रतीक है. इसके मेंटेनेंस के लिए प्रयास किया जाना चाहिए.

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