Samastipur News:सशक्तीकरण, उद्यमिता व शिक्षा स्तर सुधरने से बढ़ी रुचि

जिले की आधी आबादी यानी महिलाएं जनसंख्या के अनुपात में कम होने के बावजूद मतदान केंद्रों पर सबसे आगे दिखाई दी.

Samastipur News:प्रकाश कुमार, समस्तीपुर : जिले की आधी आबादी यानी महिलाएं जनसंख्या के अनुपात में कम होने के बावजूद मतदान केंद्रों पर सबसे आगे दिखाई दी. लोकतंत्र के इस महापर्व में महिलाओं का उत्साह पुरुषों से कहीं अधिक नजर आया. गुरुवार को सुबह से ही महिलाएं अपने घरों से निकलकर मतदान केंद्रों की ओर रुख करती दिखी भी थी. जारी रिपोर्ट के मुताबिक जिले के दस विधान सभा में 1568036 पुरुष व 1372711 महिला मतदाता है. इनमें से 1047222 पुरुष व 1062779 महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि महिलाएं अब लोकतंत्र की सशक्त भागीदार बन चुकी हैं. महिला मतदाताओं ने बताया कि वे घर के कामकाज को बाद में पूरा करने का मन सुबह ही बना लिया था, लेकिन सबसे पहले लोकतंत्र के इस पर्व में अपना योगदान देना जरूरी समझती है. यह उत्साह बताता है कि अब महिलाएं केवल घर-परिवार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि देश और प्रदेश की राजनीति में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है. पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाता अधिक मुखर नहीं होती है और वे चुपचाप अपने पसंद की पार्टी को वोट करती है.

बिहार उन नौ राज्यों में से है जिन्होंने 50% आरक्षण का विकल्प चुना

समस्तीपुर काॅलेज समस्तीपुर की प्राध्यापक डा. रीता चौहान बताती है कि भारतीय संविधान के अनुसार ग्रामीण स्थानीय सरकारों में महिलाओं के लिए कम से कम 33% सीटें आरक्षित हैं, और बिहार उन नौ राज्यों में से है जिन्होंने 50% आरक्षण का विकल्प चुना है. महिलाएं अब पहले से कहीं ज्यादा चुनावों में भाग ले रही हैं. महिला मतदान में बढ़ता रुझान विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में देखा गया है. बिहार राज्य में 50% से भी अधिक आरक्षण के मद्देनजर, स्थानीय स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक प्रभाव के बारे में आशावादी होना लाजमी है. वहीं बीआरबी कॉलेज की प्राध्यापक डा. शबनम कुमारी कहती है कि राज्य सरकार ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जो प्रगतिशील पहल की है, उसके परिणामस्वरूप राजनीतिक क्षेत्र में लैंगिक असमानताओं में कमी आई है. महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी दलों के बीच एक होड़-सी लगी है, जो भारत की चुनावी राजनीति में महिलाओं के बढ़ते दबदबे का संकेत है. सामाजिक जीवन में लंबे समय से हाशिये पर रही महिलाओं को मतदाता के तौर पर अहमियत मिलना सामान्य बात नहीं है. इस रुझान को महिला सशक्तीकरण और राजनीति में महिलाओं की बदलती स्थिति से जोड़ कर देखा जा सकता है. हाल के वर्षों में संपन्न हुए चुनावों के प्रचार अभियान से साफ जाहिर है कि महिला मतदाताओं की तरफ राजनीतिक दलों का इतना ध्यान पहले कभी नहीं रहा. एलएस डा. कुमारी रंजीता कहती है कि महिलाओं का मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना एक अच्छा संकेत है. इससे कम से कम उनसे जुड़े मुद्दे प्रकाश में आ रहे हैं. इसके पीछे दो कारण है, पहला, महिलाओं से जुड़े मुद्दों का आगे आना जैसे आजकल अखबारों में महिलाओं से जुड़े बहुत-से मुद्दे देखे जा सकते हैं. शिक्षा में भी सुधार हुआ है. दूसरा, राजनैतिक दल साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर महिलाओं को अपना वोटर बनाना चाहते हैं. महिला अपने परिवार की धुरी होती है. जब एक औरत मताधिकार को इतनी गंभीरता से लेती है तो उसका असर उनके बच्चों पर भी पड़ता है. जब वह बड़े होंगे तो वह भी मतदान को गंभीरता से लेंगे. यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत ही सकारात्मक बात है.

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