School Age Model: जिले के सरकारी स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया को पारदर्शी,वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाने के लिए शिक्षा विभाग एक बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाने जा रहा है.अब स्कूलों में बच्चों का दाखिला उनकी काबिलियत या अभिभावकों की इच्छा के बजाय विशुद्ध रूप से उनकी उम्र के हिसाब से तय होगा.विभाग की ओर से इसके लिए 'नो एज-गैप मॉडल' लागू करने की पूरी तैयारी कर ली गई है.अधिकारियों के मुताबिक आगामी नए शैक्षणिक सत्र से इस नियम को पूरी तरह जमीन पर उतार दिया जाएगा,जिससे दाखिले के नाम पर जारी मनमानी पर रोक लगेगी.
उम्र का नया गणित: पहली कक्षा के लिए 5 तो 12वीं के लिए 19 साल तय
जिला शिक्षा पदाधिकारी कामेश्वर प्रसाद गुप्ता ने बताया कि अब हर बच्चे की कक्षा उसकी उम्र के आधार पर ही निर्धारित होगी.नए नियमों के तहत पहली कक्षा में दाखिले के लिए बच्चे की न्यूनतम आयु 5 वर्ष होनी अनिवार्य कर दी गई है.इसी तरह स्कूली शिक्षा के अंतिम पड़ाव यानी 12वीं कक्षा के लिए अधिकतम आयु सीमा 19 वर्ष तय की गई है.अब तक स्कूल नामांकन का टारगेट पूरा करने के लिए नियमों को ताक पर रख देते थे.लेकिन अब न तो अभिभावक अपनी मर्जी से बच्चे की क्लास चुन पाएंगे और न ही स्कूल प्रशासन मनमानी चला सकेगा.
ग्रामीण इलाकों के क्लासरूम का बदलेगा माहौल,खत्म होगा असंतुलन
यह नया मॉडल विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की सूरत बदलने वाला साबित होगा.ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या आम थी कि 12 साल के बड़े बच्चे भी पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ते थे.इस उम्र-असंतुलन के कारण बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता था और छोटे बच्चों के साथ सामंजस्य नहीं बैठ पाता था.'नो एज-गैप मॉडल' से क्लासरूम का यह असंतुलन पूरी तरह खत्म हो जाएगा और हर बच्चे को अपनी उम्र के साथियों के साथ एक स्वस्थ माहौल मिल सकेगा.
कमजोर छात्रों को नहीं किया जाएगा डिटेन,सीधे मिलेगा प्रवेश
इस नीति का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पढ़ाई में कमजोर या अधिक उम्र के छात्रों को एक ही क्लास में रोककर उनका साल बर्बाद नहीं किया जाएगा.यदि कोई छात्र उम्र में बड़ा है और पढ़ाई में थोड़ा कमजोर भी है,तो भी उसे उसकी उम्र के हिसाब से अगली कक्षा में ही नामांकित किया जाएगा.विभाग का मानना है कि इससे बच्चों का हौसला टूटने से बचेगा और ड्रॉपआउट का खतरा बेहद कम हो जाएगा.
