जिले के अस्पतालों में गत वर्ष की तुलना में 791 कम प्रसव
2014 में जिले के 22 अस्पतालों में प्रसव के दौरान 91 नवजात की मौत हुई थी. वहीं इस वर्ष यह आंकड़ा 92 तक पहुंच गया जो चिंता का विषय है. सेहत विभाग को संस्थागत प्रसव के दौरान होने वाली इन मौतों पर नकेल कसने के लिए और भी कारगर कदम उठाने होंगे. अन्यथा मौत का यह सिलसिला यूं ही वर्ष दर वर्ष जारी रहेगा.
समस्तीपुर : जननी बाल सुरक्षा योजना के तहत जिले के विभिन्न अस्पतालों में जारी संस्थागत प्रसव में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं.
इसके विपरीत संस्थागत प्रसव के दौरान होने वाली मौत की संख्या में इजाफा हुआ है. इसी वर्ष विभाग की ओर से गत मार्च महीने में जारी फरवरी में हुए संस्थागत प्रसव की रिपोर्ट के अवलोकन से पता चलता है कि गत वर्ष इसी महीने की तुलना में 791 प्रसव कम हुए हैं. गत वर्ष फरवरी महीने में जिले के 22 अस्पतालों में 7430 प्रसव हुए. वहीं इस वर्ष यह आंकड़ा 6639 पर सिमटी रही. अकेले सदर अस्पताल के आंकड़े पर गौर करें तो वर्ष 2014 के फरवरी महीने में 782 बच्चों ने जन्म लिया था.
इसी महीने वर्ष 2015 में यहां 675 प्रसव हुए हैं. सुकून की बात यह है कि वर्ष 14 के फरवरी में सदर अस्पताल में प्रसव के दौरान जहां 16 बच्चों की मौत हो गयी थी वहीं इस वर्ष मौत की संख्या आठ तक पहुंची. यह 50 फीसदी कम है. लेकिन यही आंकड़ा जिला के स्तर पर पहुंच कर विपरीत हो गया है.
रेफर मामलों में आयी गिरावट
संस्थागत प्रसव के दौरान जच्च बच्च में से किसी की हालत बिगड़ने जैसे मामले भी वर्ष 2015 के फरवरी महीने में कम हुए. गत वर्ष इसी महीने में जिले के विभिन्न अस्पतालों से आपात स्थिति में 41 महिलाओं को बेहतर चिकित्सा के उद्देश्य से रेफर किया गया था. जबकि इस वर्ष इसकी संख्या मात्र 38 रही. विभाग के आंकड़े बोलते हैं कि इस वर्ष फरवरी महीने में सदर अस्पताल से 3, रोसड़ा से 4, दलसिंहराय, पूसा से एक एक, ताजपुर 2, वारिसनगर से 5, मोरवा से 2, सरायरंजन से 3, मोहिउद्दीननगर से 3, उजियारपुर 7, विभूतिपुर 4, सिंघिया 1 एवं विद्यापतिनगर से 2 महिलाओं को बेहतर चिकित्सा के लिए रेफर किया गया.
बोले अधिकारी
संस्थागत प्रसव के दौरान होने वाली मौत के लिए मूल रूप से कुपोषण जिम्मेदार है. इस पर नकेल कसने के लिए सेहत विभाग लगातार प्रयास कर रहा है. इसके नतीजे भी अब सामने आने लगे हैं.
डॉ गिरींद्र शेखर सिंह, सीएस, समस्तीपुर
