ऋणं कृत्वा पुस्तक की स्थापना लौकिक अध्यात्मवाद हैः डॉ राजकुमार सिन्हा

ऋणं कृत्वा पुस्तक की स्थापना लौकिक अध्यात्मवाद हैः डॉ राजकुमार सिन्हा

किताब ऋणं कृत्वा चार्वाक दर्शन की सहज यात्रा पर हुई परिचर्चा सहरसा. सर्व नारायण सिंह रामकुमार सिंह महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र के सेवानिवृत प्राध्यापक डॉ राजकुमार सिन्हा की किताब ऋणं कृत्वा चार्वाक दर्शन की सहज यात्रा पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो डॉ अशोक कुमार सिंह ने की. प्राचार्य ने इस किताब के लिए डॉ राजकुमार सिन्हा को बधाई दी एवं ऋण की महत्ता पर प्रकाश डालते चार्वाक पर अपने विचार रखे. पुस्तक के लेखक डॉ राजकुमार सिन्हा ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऋण की पात्रता में पंचमहाव्रत का पालन सहज ही समाहित है. जिसकी तार्किक परिणति लौकिक अध्यात्मवाद है. इस परिचर्चा में बारह वक्ताओं ने भाग लिया. पूर्व प्रधानाचार्या एवं हिंदी साहित्य की लेखिका डॉ रेणु सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि सुख को प्राप्त करना कौन नहीं चाहता है. चार्वाक वादियों के लिए भौतिक चीजों में सुख है तो आध्यात्मवादियों को हो सकता है. आध्यात्म में ही सुख मिलता हो. उन्होंने कहा कि वेद में विश्वास करने वाले भी हमारे अपने हैं एवं वेद में विश्वास नहीं करने वाले भी हमारे अपने हैं. डॉ नरेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि बेहतर से बेहतर जीवन कैसे जीयें, हमें इसके लिए प्रयासरत रहना चाहिए. चार्वाक दर्शन पर बोलते हुए उन्होंने कबीर पर चार्वाक के प्रभाव के बारे में बताया. इस क्रम में उन्होंने पुरुषोत्तम अग्रवाल के हवाले से कहा कि कबीर का आध्यात्म धर्मेत्तर अध्यात्म है. उन्होंने कहा कि डॉ सिन्हा ने अपनी किताब में कर्मकांड के विरोध को उदाहरण सहित समझाया है. डॉ अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि अनीश्वरवादी दर्शन मेटा फिजिक्स के कॉन्सेप्ट पर काम करता है. उन्होंने बौद्ध दर्शन के बारे में विस्तार से बताया. वे बुद्ध के दुख से संबंधित विचारों को सउदाहरण समझाया. उन्होंने शंकराचार्य, विवेकानंद से लेकर सिस्टर निवेदिता तक की बात की. हिन्दू धर्म की विभिन्न सम्प्रदायों की चर्चा की. डॉ सिन्हा की कृति में उद्धरित चार भूत की अवधारणा में उनकी सहमति दिखी. डॉ जैनेन्द्र कुमार ने चार्वाक दर्शन को बौद्ध, जैन से जोड़ते सिद्ध, नाथ, कबीर, बिरसा मुंडा एवं ज्योतिबा फुले के साथ पूरी श्रमण परंपरा तक में देखने का प्रयास किया. उन्होंने वृहस्पति से लेकर अजित केशकम्बली तक का जिक्र किया. डॉ सुभाष कुमार ने ईरानी कविता पर चार्वाक के प्रभाव को रेखांकित किया. उन्होंने उमर खय्याम का विशेष रूप से जिक्र किया. डॉ सिन्हा की किताब में ऋण लेने वालों की पात्रता पर भी विचार हुआ है. इस विचार को डॉ सुभाष ने बैंकिंग लोन के माध्यम से समझाने का प्रयास किया कि किसी सरकारी कर्मचारी को आसानी से लोन मिल जाता है. वहीं बेरोजगार लोगों को लोन नहीं मिलता या कम मिलता है. बैंक वाले भी लोन वापस करने की क्षमता को देखते हैं. डॉ प्रत्यक्षा राज ने इस किताब के सभी अध्यायों पर विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की. उन्होंने ऋण की अवधारणा को विस्तारपूर्वक बताया. साथ ही इसे लोन से भिन्न माना. उन्होंने चार्वाक शब्द की उत्पत्ति के बारे में बताते कहा कि इसे लोकायत दर्शन भी कहा जाता है. उन्होंने कहा कि अज्ञानता ही आपका परम शत्रु है एवं ज्ञान से ही इसे दूर किया जा सकता है. डॉ प्रदीप कुमार ने चार्वाक दर्शन को अनीश्वरवादी दर्शन कहा. डॉ हरिदर्शन सिंह ने धर्म पर अच्छा व्याख्यान दिया. उन्होंने वर्तमान समय में धर्म की आवश्यकताओं पर बल दिया. डॉ नृपेंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि चार्वाक के साहित्य को शाजिस के तहत गायब करवा दिया गया. डॉ अशोक कुमार ने कहा कि चार्वाक दर्शन से सभी को अवगत होना चाहिए. उन्होंने कहा कि डॉ सिन्हा की किताब इतनी सरल भाषा में है कि आम पाठक भी इसे आसानी से समझ सकते हैं. डॉ संजीव शंकर सिंह ने कहा कि भले ही दर्शन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष की बात होती हो. लेकिन हमें कहीं ना कहीं अनुमान के आधार भी चलना होता है. मंच संचालन डॉ धर्मव्रत चौधरी एवं डॉ आर्य सिन्धु ने किया. धन्यवाद ज्ञापन डॉ राजकुमार सिन्हा ने किया. सभागार में डॉ दिलीप कुमार सिंह, डॉ अनंत कुमार सिंह, डॉ संजय सिंह, डॉ अवधेश मिश्रा, डॉ मनोज पांडे, डॉ सुमन स्वराज, डॉ लीना कुमारी, डॉ गौरी, डॉ कपिलदेव कुमार पासवान, डॉ अभय नाथ पाठक, डॉ संजय कुमार सिंह, डॉ अनिरुद्ध कुमर, डॉ गोपाल कुमार, डॉ रविन्द्र साहू, डॉ पंकज कुमार, रत्नेश झा, डॉ खुशबू, असीम कुमार आंसू, अपिव्रत कुमार सिन्हा, अलंकृत कुमार सिन्हा, मो जाफरान सहित अन्य मौजूद थे.

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By Dipankar Shriwastaw

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