स्वीकृति के बाद भी अधूरा सपना, श्मशान घाट के इंतजार में सलखुआ

किसी भी गांव की पहचान उसकी जीवंतता से होती है, लेकिन सलखुआ में हर मृत्यु के साथ एक ऐसी पीड़ा जन्म लेती है, जो व्यवस्था की बेरुखी को उजागर कर देती है.

श्मशान घाट नही रहने से आमजन परेशान

सलखुआ. किसी भी गांव की पहचान उसकी जीवंतता से होती है, लेकिन सलखुआ में हर मृत्यु के साथ एक ऐसी पीड़ा जन्म लेती है, जो व्यवस्था की बेरुखी को उजागर कर देती है. यहां लोगों के पास अपनों को विदा करने के लिए भी सम्मानजनक स्थान नहीं है. श्मशान घाट के लिए जमीन स्वीकृत होने के बावजूद आज तक निर्माण नहीं हो सका है और यही अधूरा सपना अब ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा दुख बन गया है. ग्रामीणों की लगातार मांग के बाद जून 2021 में बिहार सरकार के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद के प्रयास से श्मशान घाट के लिए पहल हुई थी. तत्कालीन जिलाधिकारी के निर्देश पर तत्कालीन सीओ श्यामकिशोर यादव और प्रभारी सीआई ब्रजनंदन सिंह के नेतृत्व में सरकारी अमीन रविंद्र कुमार ने सलखुआ मौजा के खेसरा संख्या 5162 में लगभग तीन कट्ठा जमीन की मापी कर नजरी नक्शा तैयार किया. कागजों पर सब कुछ तय हो गया. जमीन भी, योजना भी. लेकिन हकीकत में आज तक एक ईंट तक नहीं जुड़ पायी. आज हालात यह है कि गांव में किसी की मृत्यु होने पर परिजनों को शोक के साथ-साथ अंतिम संस्कार की चिंता भी सताती है. मजबूरी ऐसी कि लोग अपने ही खेतों में, या फिर सड़क किनारे, विरोध और असहजता के बीच अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने को विवश हैं. बरसात के मौसम में यह पीड़ा और भी भयावह हो जाती है. गीली जमीन, कीचड़ और आसमान से गिरती बारिश के बीच अंतिम संस्कार करना मानो एक परीक्षा बन जाता है.

ग्रामीणों का कहना है कि इस समस्या को लेकर वे दर्जनों बार प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. भाकपा के ओमप्रकाश नारायण, जिप अध्यक्ष प्रतिनिधि एवं पूर्व जिप अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार यादव, मुखिया रणवीर यादव, पूर्व मुखिया व वीआईपी नेता मिथिलेश विजय, पूर्व प्रमुख अशोक यादव सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि श्मशान घाट के अभाव में हिंदू परिवारों को अपने ही खेतों में अंतिम संस्कार करना पड़ता है. जिससे कई बार विवाद और सामाजिक असहजता भी उत्पन्न होती है. जिनके पास खुद की जमीन नहीं है, उनकी स्थिति और भी दयनीय है. वे सड़क किनारे, खुले आसमान के नीचे, खानाबदोश की तरह अपने परिजनों का दाह संस्कार करने को मजबूर हैं. यह न सिर्फ एक सामाजिक समस्या है, बल्कि मानवीय गरिमा से जुड़ा सवाल भी है. सलखुआ के लोगों की एक ही मांग है कि अब और इंतजार नहीं. वे चाहते हैं कि प्रशासन जल्द से जल्द श्मशान घाट का निर्माण कराये, ताकि हर व्यक्ति को अपने प्रियजनों को सम्मानपूर्वक विदाई देने का अधिकार मिल सके, क्योंकि मौत के बाद भी इंसान को गरिमा मिलनी चाहिए और सलखुआ आज उसी गरिमा के लिए संघर्ष कर रहा है.

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By Dipankar Shriwastaw

Dipankar Shriwastaw is a contributor at Prabhat Khabar.

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