सहरसा. कोसी की बाढ़ का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है, लेकिन जिला मुख्यालय स्थित पटेल मैदान में बाढ़ विस्थापितों के लिए बनाये गये राहत शेड खुद परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं. लाखों रुपये की लागत से तैयार किये गये दर्जनों शेड वर्षों से रखरखाव के अभाव में जर्जर हो चुके हैं. अधिकांश शेडों के छप्पर के चदरे गायब हैं, जबकि बचे हुए हिस्सों पर अतिक्रमण का कब्जा बताया जा रहा है. ऐसे में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने पर विस्थापित परिवारों को यहां सुरक्षित आश्रय मिलने पर सवाल खड़ा हो गया है.
2008 की बाढ़ में हजारों लोगों को मिला था सहारा
वर्ष 2008 में कोसी की विनाशकारी बाढ़ ने सहरसा समेत पूरे इलाके में भारी तबाही मचायी थी. बड़ी संख्या में लोगों के घर और आश्रय स्थल बाढ़ के पानी में डूब गये थे. उस समय पटेल मैदान में बनाये गये राहत शेड में हजारों महिला, पुरुष और बच्चों ने शरण ली थी.
बाढ़ पीड़ितों की तत्काल जरूरत को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग ने भवन निर्माण विभाग के माध्यम से यहां दर्जनों शेड का निर्माण कराया था. निर्माण के बाद कई वर्षों तक ये शेड बाढ़ विस्थापितों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय स्थल बने रहे. बांध के भीतर और बाहर रहने वाले परिवार पानी बढ़ने पर यहां अपने परिवार के साथ पहुंचते थे.
कहीं छप्पर गायब तो कहीं लटक रहे जर्जर चदरे
वर्षों से मरम्मत नहीं होने के कारण अब इन राहत शेडों की स्थिति गंभीर हो गयी है. कहीं पूरा छप्पर गायब है तो कहीं टूटे-फूटे चदरे लटक रहे हैं. कई स्थानों पर शेड का ढांचा भी कमजोर नजर आता है. बारिश और तेज हवा के दौरान जर्जर चदरों के गिरने से हादसे की आशंका बनी हुई है.
रखरखाव के अभाव में सरकारी राशि से तैयार की गयी यह संपत्ति धीरे-धीरे बर्बाद होती जा रही है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि आपदा के समय जिस स्थान का इस्तेमाल बाढ़ विस्थापितों को तत्काल आश्रय देने के लिए होना चाहिए, वही अब खुद मरम्मत और संरक्षण की जरूरत में है.
राहत शेड पर कहीं मवेशी, कहीं क्रिकेट की पिच
शेड की बदहाली के साथ यहां अतिक्रमण भी बड़ी समस्या बन गया है. शेड के बचे हिस्से में कहीं मवेशी बांधे जा रहे हैं तो कहीं क्रिकेट की पिच बना दी गयी है. आसपास बने कमरों पर भी अतिक्रमणकारियों के कब्जे की बात सामने आ रही है. कई कमरों पर लोगों के अपने ताले लगे होने की जानकारी है.
बाढ़ की आशंका के बीच राहत स्थल की जमीन और कमरों पर इस तरह का कब्जा प्रशासन की आपदा तैयारी पर सवाल खड़ा करता है. यदि अचानक बड़ी संख्या में बाढ़ विस्थापितों को यहां लाने की जरूरत पड़ी तो पहले से मौजूद अतिक्रमण और जर्जर ढांचा बड़ी चुनौती बन सकता है.
जिम्मेदारी के फेर में फंसा राहत स्थल
जिले में बाढ़ से निपटने के लिए प्रशासन की ओर से पहले से तैयारी शुरू कर दी जाती है. संवेदनशील इलाकों, संभावित राहत शिविरों और उपलब्ध संसाधनों की समीक्षा के लिए बैठकें भी होती हैं. इसके बावजूद समाहरणालय के नजदीक स्थित पटेल मैदान के इस महत्वपूर्ण राहत स्थल की बदहाली दूर नहीं हो सकी है.
बताया जाता है कि आपदा प्रबंधन विभाग शेड को अपना बताता है, जबकि रखरखाव की जिम्मेदारी भवन निर्माण विभाग की बतायी जाती है. विभागों के बीच जिम्मेदारी के इस फेर में राहत शेड लगातार अपनी उपयोगिता खोते जा रहे हैं.
बाढ़ से पहले मरम्मत और अतिक्रमण हटाने की जरूरत
कोसी क्षेत्र में बाढ़ का खतरा बना रहने के बीच पटेल मैदान के राहत शेडों का तत्काल निरीक्षण जरूरी है. जर्जर ढांचे और टूटे चदरों की मरम्मत के साथ अतिक्रमण हटाकर पूरे परिसर को आपात स्थिति के लिए तैयार करने की जरूरत है. 2008 जैसी आपदा की स्थिति में हजारों लोगों के लिए कभी सहारा बने ये शेड फिर से उपयोगी बन सकें, इसके लिए संबंधित विभागों के बीच समन्वय के साथ जल्द कार्रवाई की आवश्यकता है.
