सहरसा, पतरघट. प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में इन दिनों मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज (एलएसडी) के लक्षण सामने आने से पशुपालकों की चिंता बढ़ गयी है. कई गांवों और बस्तियों में मवेशियों के शरीर पर गांठ, चकत्ते और घाव उभरने की शिकायत सामने आ रही है. वहीं कुछ पशुओं में तेज बुखार, कमजोरी और भूख कम लगने के लक्षण भी बताए जा रहे हैं.
कई गांवों में एक के बाद एक मवेशियों में दिख रहे लक्षण
पशुपालकों के अनुसार पिछले कुछ दिनों में बीमारी का असर तेजी से बढ़ा है. कई गांवों में एक के बाद एक मवेशियों में बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं. हालांकि, अब तक बड़े पैमाने पर पशुओं की मौत की पुष्टि नहीं हुई है. पशुपालकों का कहना है कि दूध देने वाली गायों और कम उम्र के बछड़ों को बीमारी के कारण अधिक परेशानी हो रही है.
दूध उत्पादन घटने से पशुपालन पर निर्भर परिवार प्रभावित
बीमारी से संक्रमित दूध देने वाले पशुओं में दूध उत्पादन कम होने की शिकायत है. इससे पशुपालन पर निर्भर परिवारों की आमदनी भी प्रभावित हो रही है. गंभीर स्थिति में पशु काफी कमजोर हो जाते हैं और उन्हें उठने-बैठने में भी परेशानी होने लगती है.
स्थानीय पशुपालकों ने बताया कि संक्रमित पशुओं के शरीर पर कठोर गांठें बन जाती हैं. कुछ पशुओं के मुंह और पैरों में घाव होने के कारण खाने-पीने और चलने-फिरने में परेशानी होती है. लंबे समय तक उपचार कराने के कारण पशुपालकों का खर्च भी बढ़ रहा है.
निजी चिकित्सकों और पशु अस्पतालों का ले रहे सहारा
बीमार पशुओं के उपचार के लिए पशुपालक निजी पशु चिकित्सकों और सरकारी पशु अस्पताल का सहारा ले रहे हैं. क्षेत्र के पशु दवा विक्रेताओं के अनुसार लंपी से संबंधित दवाओं की मांग बढ़ गयी है और पशुपालक लगातार दवाएं खरीदने पहुंच रहे हैं. कुछ दवाओं की उपलब्धता पर भी असर पड़ने की बात सामने आ रही है.
पशुपालकों को बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक से संपर्क करने की सलाह दी जा रही है.
मच्छर और मक्खियों से फैलता है संक्रमण
राजकीय पशु चिकित्सालय पतरघट के पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शशिभूषण प्रसाद ने बताया कि लंपी स्किन डिजीज विषाणुजनित बीमारी है. यह मुख्य रूप से मच्छर, मक्खी और अन्य रक्त चूसने वाले कीटों के माध्यम से एक पशु से दूसरे पशु तक फैलती है.
उन्होंने कहा कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर पशुपालकों को घबराने के बजाय तत्काल पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. समय पर उपचार मिलने से अधिकांश पशुओं की स्थिति में सुधार संभव है.
प्रभावित गांवों में बढ़ायी गयी निगरानी
डॉ. शशिभूषण प्रसाद ने बताया कि पशु चिकित्सा विभाग की ओर से प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ायी गयी है. विभागीय टीम गांवों का भ्रमण कर पशुपालकों को बीमारी की पहचान, बचाव और उपचार के संबंध में जागरूक कर रही है.
पशुपालकों को बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखने, पशुशाला की नियमित सफाई करने, कीट नियंत्रण के उपाय अपनाने तथा स्वच्छ पानी और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने की सलाह दी जा रही है.
विशेष चिकित्सा शिविर और टीकाकरण अभियान तेज करने की मांग
स्थानीय पशुपालकों ने जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग से प्रभावित गांवों में विशेष चिकित्सा शिविर लगाने, पर्याप्त दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा जरूरत के अनुसार टीकाकरण और जागरूकता अभियान तेज करने की मांग की है. ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते बीमारी पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर पशुधन के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
