मां बनना तो एक जैविक घटना पर मातृत्व का होना दैवीय घटनाः डॉ अरूण

मां बनना तो एक जैविक घटना पर मातृत्व का होना दैवीय घटनाः डॉ अरूण

गायत्री शक्तिपीठ में व्यक्तित्व परिष्कार सत्र का आयोजन सहरसा . गायत्री शक्तिपीठ में रविवार को व्यक्तित्व परिष्कार सत्र का आयोजन किया गया. सत्र को संबोधित करते डॉ अरुण कुमार जायसवाल ने नारी के कितने रूप के संबंध में चर्चा की. उन्होंने कहा कि प्रेम किसी के मन में हो सकता है. लेकिन मातृत्व विरले के मन में होता है. मां बनना तो एक जैविक घटना है पर मातृत्व का होना एक दैवीय घटना है. प्रेम एवं मातृत्व में बहुत फर्क है. प्रेम पत्नी पति के प्रति करती है. उन्होंने कहा कि नारी का प्रेम जब उसको अपने पति में अपनी संतान दिखने लगती है तो वह पति का पुत्रवत ख्याल रखती है. प्रेम जब पूर्ण होता है तो वह पत्नी की जगह माता बन जाती है. पत्नी का पति के प्रति जब संतान भाव आता है तब समझिए कि पत्नी का प्रेम पति के प्रति पूर्ण हो गया. संतानवत प्रेम बहुत विरल है बहुत मुश्किल है. जब नारी के अंदर मातृभाव आ जाता है तो उसे अपनी पति की गलती दिखाई नहीं देती. सचमुच संतान से नारी पूर्ण होती है. स्त्री अपने सौंदर्य के कारण पूजनीय नहीं हो सकती है. सौन्दर्य के कारण वह प्रशंसनीय हो सकती है. लेकिन वह अपने मातृत्व के कारण पूजनीय होती है. स्त्री पारस की तरह होती है जिस रिश्ते को छूती है उसे प्रेम से भर देती है. स्त्री का अस्तित्व में होना, उत्सव का विषय है. प्रेम के लिए स्त्री के अंदर प्रतीक्षा का धैर्य बहुत होता है. जितनी प्रतीक्षा स्त्री कर सकती है उतनी प्रतीक्षा कोई नहीं कर सकता. ये स्त्रियां ही कर सकती है, पुरुष नहीं कर सकता. अपने यहां विधवा होकर जो साध्वी का जीवन जीती है, वैसा किसी अन्य देश में परंपरा है ही नहीं. विधवा स्त्री तपस्विनी एवं साध्वी का स्वरूप ग्रहण करती है. स्त्री में सामर्थ्य है वह तपस्विनी एवं साध्वी दोनों बनकर रह सकती है. पुरुष में सामर्थ्य ही नहीं है कि वह यह काम कर सके.

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By Dipankar Shriwastaw

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