सहरसा का रहस्यमयी रक्तकाली चौसठ योगिनी मंदिर, जहां आस्था के साथ जुड़ी है शक्ति साधना

Aaj Ka Darshan: सहरसा के मत्स्यगंधा परिसर में स्थित रक्तकाली चौसठ योगिनी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि तंत्र साधना, शक्ति उपासना और अटूट आस्था का अनोखा संगम है. यही कारण है कि यहां हर दिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और विशेष पर्वों पर पूरा परिसर भक्तिमय ऊर्जा से भर उठता है.

विनय कुमार मिश्र की रिपोर्ट.

Aaj Ka Darshan: सहरसा शहर के प्रसिद्ध मत्स्यगंधा परिसर में स्थित रक्तकाली चौसठ योगिनी मंदिर कोसी क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को एक अलग आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव होता है. मां रक्तकाली की प्रतिमा के दर्शन के लिए सुबह से ही भक्तों का आना शुरू हो जाता है और देर शाम तक पूजा-अर्चना का सिलसिला जारी रहता है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि मां के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती. भक्त यहां सुख, शांति, समृद्धि और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं.

चौसठ योगनियों की मौजूदगी बनाती है मंदिर को खास

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित चौसठ योगिनियों की प्रतिमाएं हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार योगिनी परंपरा शक्ति साधना और तांत्रिक उपासना से जुड़ी रही है. यही वजह है कि यह मंदिर सामान्य देवी मंदिरों से अलग पहचान रखता है.

दूर-दराज के जिलों और पड़ोसी राज्यों से आने वाले श्रद्धालु यहां पूजा कर आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक शांति का अनुभव करते हैं. हाल के वर्षों में मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण और सुविधाओं में भी विस्तार हुआ है, जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ी है.

नवरात्री और काली पूजा में दिखता है भव्य आध्यात्मिक नजारा

नवरात्र और काली पूजा के दौरान रक्तकाली चौसठ योगिनी मंदिर का दृश्य बेहद आकर्षक हो जाता है. सुबह की आरती से लेकर देर रात तक भजन, कीर्तन, मंत्रोच्चार और विशेष अनुष्ठानों का आयोजन होता है.

मां रक्तकाली का विशेष श्रृंगार श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. शाम की महाआरती में बड़ी संख्या में भक्त शामिल होकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. दीपों की रोशनी और भक्तिमय वातावरण पूरे परिसर को अलौकिक आभा से भर देता है.

आध्यात्मिक टूरिज्म का भी बड़ा केंद्र

रक्तकाली चौसठ योगिनी मंदिर आज धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में भी उभर रहा है. यहां आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा-अर्चना ही नहीं करते, बल्कि मंदिर की परंपरा, इतिहास और आध्यात्मिक माहौल को भी करीब से महसूस करते हैं.

स्थानीय लोगों के अनुसार मां रक्तकाली के दरबार से कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटता. यही विश्वास इस मंदिर को सहरसा ही नहीं, बल्कि पूरे कोसी क्षेत्र की आस्था का मजबूत केंद्र बनाता है.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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