विश्व पर्यावरण दिवस: रोहतास में 2.32 वर्ग किमी घटा वन आवरण, बढ़ी चिंता

Rohtas News: विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर रोहतास जिले में घटते वन आवरण और बढ़ती गर्मी को लेकर चिंता जताई गई है. जिले में 2.32 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ है, जबकि वनाग्नि, अवैध कटाई और बदलते मौसम से पर्यावरण पर खतरा बढ़ रहा है.

Rohtas News (मो. आरिफ खान): आज विश्व पर्यावरण दिवस है. ऐसे में रोहतास जिले के पर्यावरणीय हालात पर नजर डालें तो तस्वीर चिंताजनक दिखाई देती है. बिहार में कैमूर और पश्चिमी चंपारण के बाद तीसरे सबसे बड़े वन क्षेत्र वाले जिले के रूप में पहचान रखने वाला रोहतास आज वन क्षेत्र में गिरावट, बढ़ती गर्मी, वनाग्नि और अवैध कटाई जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहा है.

हाल के वर्षों में मौसम के बदले मिजाज ने भी पर्यावरणीय चिंताओं को और गहरा कर दिया है. रोहतास जिले में कुल 669.9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन फैला हुआ है. यह बिहार के कुल वन क्षेत्र में तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा है. इसके बावजूद जिले में प्राकृतिक वन क्षेत्र अपेक्षाकृत कम है. ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में जिले में 16.7 हजार हेक्टेयर प्राकृतिक वन मौजूद था, जो जिले के कुल भूमि क्षेत्र का मात्र 4.3 प्रतिशत है. इसका अर्थ है कि जिले का 95 प्रतिशत से अधिक भूभाग प्राकृतिक हरित आवरण से वंचित है.

वन क्षेत्र में गिरावट बढ़ा रही चिंता

भारतीय वन सर्वेक्षण (आईएसएफआर) की 2019-21 रिपोर्ट के अनुसार रोहतास उन जिलों में शामिल रहा जहां वन आवरण में सर्वाधिक गिरावट दर्ज की गई. इस अवधि में जिले का वन क्षेत्र 2.32 वर्ग किलोमीटर घट गया. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि के विस्तार, अवैध कटाई और विभिन्न विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों पर दबाव बढ़ा है. यही कारण है कि वन क्षेत्र में लगातार कमी देखी जा रही है.

गर्मी ने दिखाया जलवायु परिवर्तन का असर

इस वर्ष रोहतास जिले ने भीषण गर्मी का सामना किया. पिछले दिनों तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. लगातार कई दिनों तक लू चलने से आम जनजीवन प्रभावित रहा. हाल के दिनों में हुई बारिश से लोगों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन मौसम का असंतुलित स्वरूप जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव की ओर संकेत कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि हरित क्षेत्र में कमी और जल स्रोतों पर बढ़ते दबाव का असर स्थानीय मौसम पर भी पड़ रहा है.

वनाग्नि और आक्रामक प्रजातियां भी बड़ी चुनौती

आईएसएफआर 2023 रिपोर्ट में रोहतास को बिहार के उन जिलों में शामिल किया गया जहां जंगलों में आग लगने की घटनाएं अधिक होती हैं, जो आज भी बरकरार है. दक्षिण बिहार के पठारी क्षेत्र के जिलों जमुई, मुंगेर और रोहतास में वनाग्नि लगातार चिंता का विषय बनी हुई है. जंगलों में लगने वाली आग से वन संपदा के साथ जैव विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचता है. रोहतास के जंगलों में साल (शोरिया रोबस्टा) प्रमुख वृक्ष प्रजाति है. वहीं लैंटाना कैमारा जैसी आक्रामक विदेशी प्रजाति तेजी से फैल रही है. यह स्थानीय वनस्पतियों के विकास में बाधा बन रही है और जंगलों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रही है.

राज्य में बढ़ी हरियाली, लेकिन रोहतास पीछे

बिहार में वर्ष 2005 में वन और वृक्ष आवरण कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.65 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर 15.05 प्रतिशत हो गया, जो बढ़ रहा है यानी लगभग दो दशकों में राज्य का हरित आवरण दोगुने से अधिक हुआ है. राज्य सरकार ने वर्ष 2028 तक इसे बढ़ाकर 17 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसके लिए विभिन्न स्तरों पर वृक्षारोपण और संरक्षण अभियान चलाए जा रहे हैं. इसके बावजूद रोहतास जैसे वन संपन्न जिले में वन क्षेत्र में गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है.

छोटी नर्सरियां बन रहीं उम्मीद की किरण

एक ओर जहां जंगलों पर संकट गहरा रहा है, वहीं जिले में कुछ व्यक्तिगत प्रयास पर्यावरण संरक्षण की मिसाल भी पेश कर रहे हैं. चेनारी प्रखंड के चन्द्रकैथी गांव में पूर्व मुखिया विजय शंकर दुबे द्वारा कई वर्षों से निजी पौधाशाला का संचालन किया जा रहा है. यहां शीशम, महोगनी, गंभार, यूकेलिप्टस, सागवान, काजू, शरीफा, आंवला, अमरूद, आम, अनार और शमी सहित कई प्रजातियों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं. पौधाशाला में करीब एक लाख पौधे विकसित किए गए हैं, जिनकी मांग जिले के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों से भी होती है. वन विभाग की योजनाओं के तहत भी यहां से 20 हजार पौधों की आपूर्ति की जाती है. दुबे का कहना है कि प्रशासन और समाज के संयुक्त प्रयास से वृक्षारोपण अभियान को जन आंदोलन बनाया जा सकता है. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी छोटी नर्सरियां और व्यक्तिगत पहल हरित आवरण बढ़ाने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

प्राकृतिक धरोहर को बचाने की जरूरत

बिहार के केवल 11 जिलों में प्राकृतिक वन मौजूद हैं और रोहतास उनमें प्रमुख स्थान रखता है. कैमूर वन्यजीव अभयारण्य की सीमाएं जिले को प्राकृतिक संरक्षण का मजबूत आधार प्रदान करती हैं. यहां के शुष्क पर्णपाती साल वन पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध कटाई पर सख्ती, वनाग्नि नियंत्रण, भूजल संरक्षण और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के जरिए ही इस प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सकता है.

विश्व पर्यावरण दिवस पर संदेश साफ है. पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जंगलों को बचाना भी उतना ही जरूरी है. रोहतास की हरियाली केवल जिले की पहचान नहीं, बल्कि पूरे बिहार की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर है. इसे सुरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है.

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Published by: Vikas Jha

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