सासाराम कार्यालय : नगर सरकार का दो वर्ष नौ जून को पूरा हुआ था. अभी अविश्वास की सुगबुगाहट ही हुई थी कि कंचन देवी ने अपने पद से इस्तीफा दे सभी को चौका दिया. राजनीतिक हलकों में बवंडर मच गया कि अविश्वास की बात ही कंचन देवी ने समाप्त कर दी. अब तो फिर से चुनाव होगा. फिर, 2017 वाली राजनीतिक रणनीति व कूटनीति चलेगी.
किसी ने कहा कि विपक्ष को सकते में डालने के लिए यह राजनीतिक चाल है, तो किसी ने कहा कि काफी दिनों तक पार्षदों के खर्च का बोझ नहीं उठाने का रणनीतिकारों की रणनीति है. लेकिन, वर्तमान में मामला सीधे चाल पर आ गया है. पुरानी सरकार से बिदके कुछ पार्षद भी नोटों की धार में बहने लगे हैं, तो सरकार के वफादार अपनी कीमत बढ़ा दिये हैं.
तभी तो नगर पर्षद से लेकर पूरे शहर में कुछ पार्षदों के 10 नंबरी बनने की चर्चा जोरों पर है. जानकारों की माने तो 2017 में सरकार बनाने में जीतना खर्च हुआ था, उससे कई गुना ज्यादा धन इस समय सरकार को पुन: लाने या नयी सरकार बनाने में हो रहा है. इस्तीफा से उपजे माहौल को भांपते हुए 2017 में छह लाख रुपये में अपना वोट बेचने वाले पार्षद इस समय 10 लाख रुपये तक के औकात के हो गये हैं.
सूत्रों की माने तो दोनों ओर से दो के गुणक में रुपये की बोली लग रही है. कुछ पार्षद अपने-अपने खेमे के मालिक के कब्जे में हैं, तो जो छिटक कर बचे हुए हैं, वे अपनी बोली लगाने को आतुर हैं. 13 जून को मुख्य पार्षद ने इस्तीफा दिया है और तभी से कई पार्षद अपने गुरूओं व चाटुकारों के साथ शहर से गायब हैं. वे कहां हैं, इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उनके रहने व खाने पर प्रतिदिन दो से ढ़ाई लाख रुपये का खर्च आ रहा है.
यानी बहुमत के लिए एक पक्ष को कम से कम डेढ़ से दो करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. दोनों ओर के खर्च को जोड़े तो यह कम से कम तीन करोड़ रुपये बैठेगा. अब लोगों का दिमाग चकरा रहा है कि इतने रुपये खर्च कर बनने वाली सरकार शहर का कितना भला करेगी? क्या वह नाम के लिए इतने रुपये खर्च कर रही है कि लोगों के टैक्स रूपी धन से अपने धन को दोगुना करने के लिए? यह तो समय ही बतायेगा.
