Rajya Sabha Election 2026: बिहार की राजनीति में एक बार फिर ‘जोड़-तोड़’ और ‘सियासी गणित’ का दौर शुरू हो गया है. राज्यसभा की पांच सीटों पर होने वाले चुनाव ने पटना से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज कर दी है. विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो एनडीए की चार सीटों पर जीत तय मानी जा रही है, लेकिन असली सस्पेंस ‘पांचवीं सीट’ को लेकर है. इस एक सीट के लिए एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच शह-मात का खेल शुरू हो चुका है.
एनडीए को पांचवीं सीट के लिए महज 3 अतिरिक्त वोटों की दरकार है, जबकि विपक्ष को अपनी साख बचाने के लिए 6 वोटों का जुगाड़ करना होगा. ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और मायावती की बसपा की भूमिका किसी ‘एक्स-फैक्टर’ से कम नहीं रहने वाली है.
चार सीटें तय, पांचवीं पर असली मुकाबला
बिहार विधानसभा की मौजूदा संरचना में एनडीए के पास मजबूत बहुमत है और चार सीटों पर उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है. लेकिन पांचवीं सीट जीतने के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ेगी. इसी वजह से छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका निर्णायक बन गई है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर एनडीए कुछ अतिरिक्त वोट जुटा लेता है तो वह पांचों सीटें जीत सकता है. वहीं विपक्ष के लिए एक सीट जीतना भी राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.
ओवैसी और मायावती पर टिकी निगाहें
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा दो नेताओं को लेकर है,ओवैसी और मायावती. माना जा रहा है कि उनकी पार्टियों के विधायक इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
विपक्ष खासतौर पर ओवैसी के रुख पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन में जगह नहीं मिलने की टीस अब भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है. ओवैसी की पार्टी अपना उम्मीदवार उतार सकती है, जिससे चुनाव का गणित और उलझ सकता है.
तेजस्वी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई
राजद के लिए यह चुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं बल्कि राजनीतिक ताकत दिखाने का मौका भी है. तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अब भी सत्ता पक्ष को चुनौती देने की स्थिति में है.
अगर विपक्ष एक सीट जीतता है तो यह तेजस्वी के नेतृत्व के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक संबल होगा और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में उनकी भूमिका मजबूत हो सकती है.
एनडीए में भी दावेदारी की हलचल
सत्ता पक्ष के भीतर भी राज्यसभा टिकट को लेकर चर्चा तेज है. रालोमो प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और उनके समर्थक चाहते हैं कि उन्हें फिर मौका मिले. वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) में भी राज्यसभा सीट को लेकर अटकलें जारी हैं. पार्टी से कौन जाएगा, इस पर अंतिम फैसला चिराग पासवान को लेना है.
यह स्थिति बताती है कि चुनाव सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता का नहीं बल्कि दलों के भीतर शक्ति संतुलन का भी मामला बन चुका है.
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