याद करो कुर्बानी : नमक आंदोलन से जल उठा था पूरा पूर्णिया

12 मार्च 1930, ब्रिटिश राज के एकाधिकार के खिलाफ बापू ने साबरमती में नमक आंदोलन की नींव डाली थी.

पूर्णिया. 12 मार्च 1930, ब्रिटिश राज के एकाधिकार के खिलाफ बापू ने साबरमती में नमक आंदोलन की नींव डाली थी. और उनके आह्वान पर इसी दिन पूर्णिया में भी रुपौली के टीकापट्टी स्थित कारी कोशी के तट पर पूर्णिया में नमक आंदोलन का बिगुल फूंका गया था. पूर्णिया के अशर्फी लाल वर्मा अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ इस आंदोलन में उभर कर आए थे. अचानक हुए इस आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत के अफसरान परेशान हो उठे. अशर्फी लाल वर्मा और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी के लिए मोर्चाबंदी शुरू हो गयी. पर वे अपने साथियों के संग अंग्रेजों को हमेशा छकाते हुए जिले में लगातार नमक आंदोलन की अलख जगाते रहे. बोकाय मंडल, अनाथकांत बसु, के एल कुण्डू, सुखदेव नारायण सिंह, गोकुल कृष्ण राय,सत्येन्द्र नाथ राय,हर लाल मित्रा आदि ने हाल ही में मिलकर जिला कांग्रेस कमेटी का गठन किया था. जैसे ही बापू ने साबरमती से नमक आंदोलन शुरू किया सभी इससे जुड़ गये और इस आंदोलन को सफल बनाया. आंदोलन सफल होने पर अशर्फी बाबू ने चैन की सांस लेनी शुरू ही की थी कि अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें एक वर्ष कारावास की सजा सुनायी गयी. 1931 में वे हजारीबाग जेल से बाहर आए. बाद में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस यहां आए थे, तो उनके स्वागत का जिम्मा अशर्फी बाबू को ही सौंपा गया था.

बनमनखी में उखाड़ी थी रेल की पटरियां

स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्णिया के कई वीर सपूतों ने सक्रिय भागीदारी निभायी और आंदोलन को सशक्त किया था. सन 1942 के आंदोलन में बनमनखी थाना क्षेत्र के दमगड़ा गांव के स्व. अनुप लाल मेहता एवं पूर्णिया कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ राजीव नंदन यादव के पिता स्व. हरिकिशोर यादव का उल्लेखनीय योगदान रहा है. स्व. मेहता के नेतृत्व में बनमनखी तथा आसपास की रेल पटरियां उखाड़ दी गयी थी और विशाल जनसमूह ने थाना को कब्जे में लेकर वहां तिरंगा फहरा दिया था. इसके लिए उन्हें फांसी की सजा सुनायी गयी थी, लेकिन बाद में हाई कोर्ट ने बरी कर दिया था.

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