केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहें शिक्षक, बच्चों में व्यक्तित्व निर्माण भी करें

बच्चों में व्यक्तित्व निर्माण भी करें

सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य कार्यशाला शुरू, गुणवत्ता पर विशेष जोर पूर्णिया. थाना चौक स्थित सरस्वती शिशु मंदिर एवं सरस्वती बालिका विद्या मंदिर में गुरुवार से त्रिदिवसीय आचार्य कार्यशाला का शुभारंभ हुआ. कार्यशाला में विद्यालय के आचार्य व दीदियों ने भाग लिया. कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग प्रचारक रौशन सिंह राणा, विद्यालय सचिव वीरेंद्र कुमार मेहता, सरस्वती बालिका विद्या मंदिर की प्रधानाचार्य सरोज कुमारी एवं सरस्वती शिशु मंदिर की प्रधानाचार्य मेनका कुमारी द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती की वंदना के साथ किया गया. कार्यशाला के प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए रौशन सिंह राणा ने कहा कि त्रिदिवसीय आचार्य कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य आचार्यों के शिक्षण कौशल का समग्र विकास करना है. उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर परिवर्तन हो रहा है, इसलिए आचार्यों को नई-नई शिक्षण विधियों एवं तकनीकों से परिचित होना आवश्यक है, ताकि वे भैया-बहनों को प्रभावी और रोचक ढंग से शिक्षा प्रदान कर सकें. उन्होंने कहा कि कार्यशाला के माध्यम से आचार्यों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली, डिजिटल टूल्स तथा गतिविधि-आधारित शिक्षण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इससे शिक्षण प्रक्रिया अधिक व्यवहारिक, रोचक एवं परिणाममुखी बन सकेगी. शिक्षकों को यह भी बताया जा रहा है कि वे भैया-बहनों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दें. जिसमें उनके नैतिक, मानसिक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास को समान रूप से महत्व दिया जाए. कार्यशाला में इस बात पर भी जोर दिया गया कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहें, बल्कि भैया -बहनों में अच्छे संस्कार, अनुशासन एवं नैतिक मूल्यों का भी विकास करें. विभिन्न सत्रों में आचार्य अपने अनुभवों एवं कक्षा में आने वाली समस्याओं को साझा कर रहे हैं व उनके समाधान पर विचार-विमर्श किया जा रहा है. इससे आचार्य को व्यावहारिक समस्याओं का समाधान खोजने में सहायता मिल रही है. शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य मेनका कुमारी ने कार्यशाला के उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर सुधार लाना समय की आवश्यकता है. उन्होंने आचार्यों को प्रेरित करते हुए कहा कि उनका दायित्व केवल पाठ पढ़ाना ही नहीं, बल्कि भैया-बहनों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना भी है. उन्होंने सभी आचार्यों से आग्रह किया कि वे इस कार्यशाला से प्राप्त ज्ञान एवं अनुभवों को अपने शिक्षण कार्य में अपनाएं, जिससे विद्यालय के शैक्षणिक स्तर में और अधिक सुधार हो सके. कार्यशाला के दौरान विभिन्न विषयों पर सत्र आयोजित किए जा रहे हैं. जिनमें शिक्षण पद्धतियों में नवाचार, कक्षा प्रबंधन, कमजोर भैया-बहनों के लिए विशेष रणनीति व विद्यार्थियों के व्यवहार संबंधी समस्याओं के समाधान जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं. त्रिदिवसीय कार्यशाला से न केवल आचार्य के ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि होगी बल्कि विद्यालय की समग्र शिक्षा व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है.

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Author: ARUN KUMAR

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