पूर्णिया शहर के कोलाहल से दूर मरंगा और हरदा के बीच स्थित बाबा सिंहेश्वर नाथ मंदिर आस्था और सनातन दर्शन का एक अत्यंत पावन केंद्र है. आमतौर पर शिवालय और वैष्णव मंदिरों की परंपराएं अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन इस धाम की खासियत यह है कि यहां भगवान शिव और युगल सरकार राधा-कृष्ण एक ही प्रांगण में विराजमान हैं. यह मंदिर 'हर' यानी महादेव और 'हरि' यानी श्रीकृष्ण के एकाकार स्वरूप का जीवंत प्रतीक बनकर श्रद्धालुओं को असीम आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है.
'हर' और 'हरि' की एकता का जीवंत स्वरूप
सनातन मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और श्रीकृष्ण एक-दूसरे के अनन्य उपासक माने जाते हैं. दोनों के मंदिर अलग-अलग निर्मित हैं, लेकिन दोनों का आंगन एक ही है. श्रद्धालु एक ही परिक्रमा में महादेव के शिवलिंग पर जलाभिषेक भी करते हैं और राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की आरती भी उतारते हैं.
पांच दशक पुराना है मंदिर का इतिहास
यह पावन स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप कारी कोसी नदी के किनारे मनोरम व शांत वातावरण में स्थित है. स्थानीय ग्रामीण इस इलाके को नया टोला के नाम से भी पुकारते हैं. बीते पचास वर्षों से यह मंदिर क्षेत्रवासियों की आस्था की धुरी बना हुआ है.
गुरुवार को उमड़ती है भक्तों की भीड़
यूं तो हर रोज यहां साधु-संतों का जमावड़ा और भजन-कीर्तन चलता रहता है, लेकिन गुरुवार के दिन राधा-कृष्ण के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं. प्रकृति की गोद में बने इस मंदिर में आकर लोग मानसिक शांति महसूस करते हैं.
सावन और महाशिवरात्रि में दिखता है देवघर जैसा नजारा
सावन के महीने और महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां का माहौल पूरी तरह बदल जाता है. बोल-बम के जयकारों और कांवड़ियों की सेवा से पूरा परिसर बाबा बैद्यनाथ धाम देवघर जैसा प्रतीत होने लगता है.
भादों में सजता है मथुरा-वृंदावन का रंग
भाद्रपद में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मंदिर को मथुरा-वृंदावन की तर्ज पर सजाया जाता है. पर्व-त्योहारों के दौरान मंदिर समिति श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध करती है, जहां देर शाम तक स्थानीय मंडलियों द्वारा भक्ति संगीत प्रस्तुत किया जाता है.
