"बदलते परिवेश में प्रेमचंद की कहानियों का पुनर्पाठ अनिवार्य"— कलाभवन में धूमधाम से मनाई गई मुंशी प्रेमचंद की जयंती

पूर्णिया के कलाभवन में मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. वरिष्ठ साहित्यकारों ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के आधुनिक दौर में उनके साहित्य की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है. साहित्यकारों ने इस बात पर जोर दिया कि उनकी कहानियों का पुनर्पाठ आज के सामाजिक परिवेश को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है.

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर पूर्णिया स्थित कलाभवन साहित्य विभाग की ओर से एक भव्य विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. समारोह में जिलेभर से जुटे वरिष्ठ साहित्यकारों, शिक्षाविदों और विचारकों ने मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि आज के आधुनिक दौर में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है.

कथा साहित्य के स्वर्णिम युग के रचनाकार थे प्रेमचंद

दीप प्रज्वलन और मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण के साथ शुरू हुई इस विचार गोष्ठी में साहित्यकारों ने उनके योगदान को रेखांकित किया:

  • डॉ. निरुपमा राय (संयोजिका, साहित्य विभाग): "प्रेमचंद आने वाले कथाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. आज के इस बदलते सामाजिक परिवेश में उनकी कहानियों को नए सिरे से पढ़ने और उनका पुनर्पाठ करने की सख्त आवश्यकता है."
  • मुख्य अतिथि डॉ. संजय कुमार सिंह (प्राचार्य, KB झा कॉलेज): "प्रेमचंद की रचनाओं में भारत की वास्तविक आत्मा का निवास है. वे हिंदी कथा साहित्य के मील के पत्थर हैं. उन्होंने पहली बार लोक जीवन के धरातलीय यथार्थ को साहित्य का मुख्य विषय बनाया. इसलिए उनके लेखन का मूल्यांकन विराट स्वरूप में होना चाहिए."

'परियों और बेताल की कहानियों से बाहर निकाल समाज को दिखाया दर्पण'

विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रभात नारायण झा ने कहा कि प्रेमचंद से पहले कथा साहित्य में परियों, बेताल और गुड्डे-गुड़ियों की काल्पनिक कहानियां ही प्रचलित थीं. प्रेमचंद पहले ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने समाज के शोषित और वंचित वर्ग के सच को अपनी कहानियों में उकेरा.

  • डॉ. शिव मुनि यादव ने 'सद्गति' और 'ठाकुर का कुआं' जैसी कालजयी कहानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रेमचंद ने कभी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया और अपने समय के यथार्थ का निर्भीक चित्रण किया.
  • डॉ. उषा शरण ने प्रेमचंद के पैतृक गांव लमही की अपनी यात्रा का अनुभव साझा किया, वहीं डॉ. केके चौधरी ने प्रसिद्ध कहानी 'मंत्र' की सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत की.

काव्य पाठ से सामाजिक विडंबनाओं पर प्रहार

सारस्वत समारोह के द्वितीय सत्र में स्थानीय कवियों ने सामाजिक विषयों पर आधारित अपनी कविताओं का पाठ किया.

  • काव्य पाठ करने वाले कवि: मीना सिंह, सुनील समदर्शी, छाया जोशी, मनोज कुमार राय, डॉ. निशा प्रकाश, वंदना कुमारी, ललिता कुमारी एवं विमल कुमार.
  • गरिमयी उपस्थिति: कार्यक्रम में महेश विद्रोही, मुकेश कुमार, मलय कुमार झा, विपिन सिंह, मिथिलेश राय, अमित कुमार झा सहित भारी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे.

कार्यक्रम के अंत में संयोजिका डॉ. निरुपमा राय ने सभी आगत अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया.


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By अखिलेश चंद्रा

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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