पूर्णिया के अंतर्राज्यीय बस स्टैंड परिसर में स्थित हनुमान मंदिर दशकों से यात्रियों, वाहन चालकों और स्थानीय लोगों के अटूट विश्वास का केंद्र बना हुआ है. लंबी दूरी की बस पकड़ने वाले मुसाफिर सफर शुरू करने से पहले मंदिर की चौखट पर माथा टेकना अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानते हैं. मंदिर परिसर में स्थापित भगवान हनुमान की मनोहारी प्रतिमा श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है.
सफर से पहले सुरक्षा की मन्नत
बस स्टैंड से प्रतिदिन खुलने वाली सैकड़ों बसों के यात्री अपनी यात्रा की निर्विघ्नता और सुरक्षा की कामना लेकर मंदिर पहुंचते हैं. मुसाफिरों के साथ-साथ बस चालक और सहकर्मी भी स्टीयरिंग थामने से पहले पवनपुत्र के चरणों में शीश नवाते हैं.
मंगलवार को सुंदरकांड और शनिवार को महाभोग
मंदिर में रोजाना पूजा-अर्चना होती है, लेकिन मंगलवार और शनिवार का दिन विशेष अनुष्ठान का होता है. मंगलवार को सामूहिक सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया जाता है. वहीं शनिवार को खिचड़ी का महाभोग लगाकर राहगीरों और यात्रियों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है.
पर्व-त्योहारों पर विशेष धार्मिक आयोजन
हर रविवार की शाम मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है. इसके अलावा गंगा दशहरा पर रामायण पाठ और रामनवमी के मौके पर 24 घंटे का भव्य अष्टयाम संकीर्तन आयोजित किया जाता है. इन आयोजनों के प्रबंधन में स्थानीय सेवक संजीव सिंह, दिलीप पाठक और बाजार के दुकानदार सक्रिय भूमिका निभाते हैं.
42 वर्ष पुराना है मंदिर का इतिहास
स्थानीय जानकारों के मुताबिक, इस मंदिर का इतिहास लगभग 42 साल पुराना है. वर्ष 1984 के आसपास जब पूर्णिया में अंतर्राज्यीय बस स्टैंड का निर्माण हुआ था, उसी समय इस मंदिर की स्थापना की गई थी. तत्कालीन प्रशासनिक सहयोग से स्थापित यह छोटा सा मंदिर आज समूचे सीमांचल क्षेत्र के मुसाफिरों के लिए आस्था का बड़ा प्रतीक बन चुका है.
