मिथिलांचल के सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक 'मधुश्रावणी' पर्व शुरू, 15 अगस्त को 'टेमी' दागने की रस्म के साथ होगा समापन

सीमांचल व मिथिलांचल का 15 दिवसीय लोक पर्व 'मधुश्रावणी' श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. यह पर्व दांपत्य प्रेम और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक है. 15 अगस्त को 'टेमी' रस्म के साथ इसका समापन होगा.

सीमांचल व मिथिलांचल के सांस्कृतिक वैभव और दांपत्य प्रेम का प्रतीक 15 दिवसीय लोक पर्व 'मधुश्रावणी' इन दिनों पूर्णिया सहित पूरे क्षेत्र में अपार हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है. बीते 3 जुलाई से प्रारंभ हुआ यह कठिन अनुष्ठान आगामी 15 अगस्त को तीज के पावन अवसर पर पारंपरिक 'टेमी' दागने की रस्म के साथ विधि-विधान से संपन्न होगा. मिथिला संस्कृति में शादी के पहले साल नवविवाहिताओं द्वारा रखे जाने वाले इस व्रत का विशेष आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है.

ससुराल से आता है 'भार', बिना नमक के भोजन का नियम

पहली बार मधुश्रावणी का व्रत कर रहीं पूर्णिया की नीशू ने बताया कि मिथिला परंपरा के अनुसार, पूरे 15 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्रियां नववधू के ससुराल पक्ष से आती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'भार' कहा जाता है:

  • 'भार' की सामग्री: इसमें नवविवाहिता के लिए नए वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, पूजा के पीतल व कांसे के बर्तन, अरवा चावल, मेवे, फल और पारंपरिक मिठाइयां शामिल होती हैं.
  • कठिन नियम-निष्ठा: व्रत के दौरान नवविवाहिता लगातार 15 दिनों तक बिना नमक का (अरवा) भोजन ग्रहण करती हैं और पूर्ण सात्विकता व निष्ठा का पालन करती हैं.

'फूल लोढ़ना' और बासी फूलों से विषहरा-शिव की पूजा

मधुश्रावणी पूजा की सबसे अनूठी परंपरा इसकी पूजा विधि है. प्रतिदिन शाम के समय नवविवाहिताएं अपनी सहेलियों के साथ पारंपरिक मैथिली लोकगीत गाते हुए बाड़ी-बगीचों में 'फूल लोढ़ने' (फूल तोड़ने) निकलती हैं:

अद्वितीय परंपरा: "शाम को तोड़े गए इन फूलों और विशेष पत्तों (नागफनी, विषहरा और मैना के पत्ते) से अगले दिन सुबह विषहरा (नाग देवता) तथा भगवान शिव और माता पार्वती की बासी फूलों से विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. पूजा के दौरान रोजाना बुजुर्ग महिलाओं द्वारा शिव-पार्वती, नाग-नागिन और राजा सलहेश से जुड़ी पौराणिक कथाएं सुनाई जाती हैं."

15 अगस्त को 'टेमी' दागने के साथ होगा समापन

आगामी 15 अगस्त को तीज के दिन मधुश्रावणी व्रत का समापन होगा. अंतिम दिन जलते दीपक की बाती (टेमी) से नवविवाहिता के घुटने या पैर को आंशिक रूप से दागने की 'टेमी रस्म' अदा की जाएगी. यह कठिन रस्म पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी शादीशुदा जीवन का प्रतीक मानी जाती है. मिथिला की यह प्राचीन परंपरा नवदंपति के रिश्ते में मिठास घोलने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखती है.


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लेखक के बारे में

By विकास वर्मा

विकास वर्मा प्रिंट माध्यम में 15 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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