... ‘महाजन छुट्टी दे, म्हारी गोरी रो परवानो, आयो रे, पिया मन ले दे रे श्याम सुंदर बंगड़ी...

शहर के गुलाबबाग में बिखरने लगी है राजस्थानी गीतों की सतरंगी छटा

होली आते ही गुलाबबाग में दिख रही भंग, चंग, रंग और तरंग की उमंग

शहर के गुलाबबाग में बिखरने लगी है राजस्थानी गीतों की सतरंगी छटा

पूर्णिया. होली के दिन करीब आते ही शहर के गुलाबबाग में भंग, चंग, रंग, अंग और तरंग के उमंग की मस्ती का नजारा है. यहां शाम होते ही चहुंओर राजस्थानी संस्कृति की छटा बिखरनी शुरु हो जाती है. फिर फिजां में गूंजने लगते हैं ‘महाजन छुट्टी दे,म्हारी गोरी रो परवानो,आयो रे, घर की गोरी म्हारी रे, कागज बांचो बेगा आओ,फागण आयो रे…पिया मन ले दे रे श्याम सुंदर बंगड़ी…राजा बल रे दरबार मची रे होली… किता रेबरसा रो म्हारो कंवर कन्हीयो रे … रुत आई रेपपइया थारे बोलण की’ जैसे राजस्थान के पारंपरिक गीत जिसमें फाग की मस्ती है, पलायन का दर्द है तो विरह की वेदना भी है. यही नहीं, इसमें सास-ननद और परिवार का ताना है और सामाजिक बाना भी है. चांग की थाप पर राजस्थान के पारंपरिक गीतों के गायन का यह अंदाज गुलाबबाग की होली की पहचान बन गई है जहां देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ रखने वाले मारवाड़ी समाज का बड़ा बसेरा है. दरअसल, शिवरात्रि के बाद से ही गुलाबबाग पर फागुन का रंग चढ़ गया है. यहां रह रहे राजस्थान के मारवाड़ी समुदाय के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत के अनुसार होली की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं. अहम यह है कि इस ग्लोबल कल्चर के दौर में भी अपनी लोक संस्कृति से जुड़ी पंरपराओं को मारवाड़ी युवा वर्ग आत्मसात कर रहे हैं. शाम के बाद परम्परागत वाद्ययंत्र चांग की थाप पर भारी संख्या में मारवाड़ी समुदाय के बच्चे, युवा और बुर्जुग होली के गीत गाकर नाचते हुए नजर आते हैं. शिवरात्रि के बाद से हर रोज कभी किसी के घर तो कभी किसी मंदिर में राजस्थान के चांग पंरपरा का धमाल देखने को मिल रहा है. होली आने तक हर रोज मारवाड़ी समुदाय के लोग इकट्ठा होकर चांग बजाकर राजस्थानी लोकगीत गाकर आनंद उठाते रहेंगे. गुलाबबाग में यह परंपरा विगत कई दशकों से चली आ रही है. होली आने तक गुलाबबाग का यह इलाका मिनी राजस्थान नजर आता है.

परंपरा, उत्साह और उल्लास का संगम

गुलाबबाग में इन दिनों परंपरा, उत्साह और उल्लास का अनूठा संगम दिख रहा है जिसमें अन्य समाज के लोग भी अपनी भागीदारी निभाते हैं. आलम यह है कि यहां शाम से ही राजस्थानी लोक संस्कृति की झलक दिखाई देने लगी है. होली गीतों की महफिल जब परवान चढ़ती है तो सांग यानी बहुरूपिया बनकर भी युवा और बच्चे नृत्य करते हैं. इस बीच हंसी मजाक का भी दौर खूब चलता है. पूछे जाने पर रुपेश डुंगरवाल और सुमित लोहिया कहते हैं कि निश्चित रुप से अब समय बदला है और संस्कृति बदली है. लेकिन बुजुर्गों की बनाई परंपराओं की रस्म को कायम रखना आज के दौर के युवाओं की जिम्मेदारी है. यहां इसी का निर्वाह किया जा रहा है. चंग की थाप और फाग गीतों की गूंज के बीच वे यहां राजस्थानी मिट्टी की खुशबू को महसूस करते हैं. इस टोली में प्रदीप शारडा, संजय बोथरा, गौतम फूलफगर, दिनेश बजाज,रौनक बजाज, सुमित नाहटा, अमित बोथरा,अनिल भंसाली,सुनील सिंह, धीरज श्रीमाल, राघव लाहोटी, राकेश, पवन,मानक बोथरा,अनिल भंसाली, धीरज पुगलिया, सुमित, पारस बैद आदि का उत्साह देखते ही बनता है.

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